मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंषष्ठोऽङ्कः ३९६
**चन्दनकः—**कधं अज्जओ गोवालदरओ सेणवित्तासिदो विअ पत्तरहो साउणिअस्स हत्थे णिवडिदो। (विचिन्त्य) एसो अणवराधो सरणाअदो अज्जचारुदत्तस्स पवहणं आरूढो पाणप्पदस्स मे अज्जसव्विलअस्स मित्तं, अण्णदो राअ-णिओओ। ता किं दाणि एत्थ जुत्तं अणुचिट्ठिदुं? अथवा, जं भोदु, तं भोदु पढमं ज्जेव अभअं दिण्णं। (कथमार्यको गोपालदारकः श्येनवित्रासित इव पत्ररथः शाकुनिकस्य हस्ते निपतितः। एषोऽनपराधः, शरणागतः, आर्यचारुदत्तस्य प्रवहणमारूढः, प्राणप्रदस्य मे आर्यशर्विलकस्य मित्रम्; अन्यतो राजनियोगः। तत् किमिदानीमत्र युक्तमनुष्ठातुम्? अथवा यद्भवतु तद्भवतु, प्रथममेवाभयं दत्तम्।)
भीदाभअप्पदाणं दत्तस्स परोवआर-रसिसस्स।
जइ होइ होउ णासो तहवि अ लोए गुणो ज्जेव्व ॥ १६ ॥
**विमर्श—**किसी की शरण में जानेवाला व्यक्ति उससे अपनी रक्षा की आशा करता है। अतः यदि कोई शरणागत की रक्षा न करके अपना स्वार्थ ही देखता है, वह समाज में सर्वत्र निन्दित ही होता है। अतः चन्दनक निन्दा के भय से शरणागत आर्यक की रक्षा में ही लग जाना उचित मानता है। एक कार्य के प्रति अनेक कारणों का उपन्यास होने से समुच्चय अलंकार है। आर्या छन्द है ॥ १६ ॥
**शब्दार्थ—**श्येनवित्रासितः=बाज से डराया गया, पत्ररथः=साधारण पक्षी, शाकुनिकस्य=शिकारी बहेलियाके, निपतितः=आ गिरा, प्राणप्रदस्य=जीवनदान करने वाले, अनपराधः=निरपराध, राजनियोगः=राजा का कार्य=आदेश, अनुष्ठातुम्=करना, यद्भवतु तद्भवतु=जो हो सो हो ॥
**अर्थ—चन्दनक—**क्या अहीर का पुत्र आर्यक बाज से भयभीत पक्षी के समान शिकारी बहेलिया के हाथ में आ गिरा ? (सोंचकर) (एक ओर तो) यह निरपराध है, (मेरी) शरण में आया है, आर्य चारुदत्त की गाड़ी पर चढ़ा=बैठा है, जीवनदान देने वाले आर्य शर्विलक का मित्र है दूसरी ओर राजा का आदेश है। इसलिये इस विषय में क्या करना उचित है। अथवा जो हो, सो हो [मैं तो] पहले ही अभय प्रदान कर चुका हूँ।
**टीका—**श्येनेन=हिंसकपक्षिविशेषेण, वित्रासितः=भयं प्रापितः, पत्रम्=पक्ष एव रथः=यानसाधनं यस्य सः, पक्षी इत्यर्थः, शाकुनिकः=शकुनिवधेन जीविकानिर्वाहकः व्याध इत्यर्थः, निपतितः=स्वयमेव आपतितः, अनपराधः=अपराधरहितः, शरणागतः = आश्रये समागतः, प्रवहणम् = यानम्, प्राणप्रदस्य = जीवनप्रदातुः, राजनियोगः=राजाज्ञा, राजकार्यं वा, अत्र=द्विविधास्पदे विषये।
**अन्वयः—**भीताभयप्रदानम्, ददतः, परोपकाररसिकस्य, (पुरुषस्य) यदि, नाशः, भवति, भवतु, तथापि, लोके, गुणः, एव, [अस्ति] ॥ १६ ॥