भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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पृष्ठ 488

४०० | मृच्छकटिकम्

( भीताभयप्रदानं ददतः परोपकाररसिकस्य । यदि भवति, भवतु नाशस्तथापि च लोके गुण एव ॥ १९ ॥ )

( सभयमवतीर्य ) दिट्ठो अज्जओ (इत्यर्धोक्ते) ण, अज्जआ वसन्तसेणा । तदो एसा भणादि--‘जुत्तं ण्णेदं, सरिसं ण्णेदं जं अहं अज्जचारुदत्तं अहिसारिदुं गच्छन्ती राअमग्गे परिभूदा ।' ( दृष्ट आर्यः, न, आर्या वसन्तसेना । तदेषा भणति--'युक्तं नेदम्, सदृशं नेदम्, यदहमार्यचारुदत्तमभिसर्तुं गच्छन्ती राजमार्गे परिभूता ।' )

वीरकः--चन्दणआ ! एत्थ मह संसओ समुप्पण्णो । ( चन्दनक ! अत्र मम संशयः समुत्पन्नः । )


शब्दार्थ--भीताभयप्रदानम् = डरे हुये को अभयदान, ददतः = देने वाले, परोपकाररसिकस्य = परोपकार करने के प्रेमी ( पुरुषस्य=व्यक्ति ) का, यदि=अगर, नाशः=विनाश, मृत्यु आदि, भवति=हो जाती है, भवतु=हो जाय, तथापि=फिर भी, लोके=संसार में, [ वह विनाश भी ], गुणः=गुण, अच्छाई, एव=ही, [ अस्ति=है ] ॥ १६ ॥

**अर्थ--**भयभीत को अभय प्रदान करने वाले परोपकार के प्रेमी [ पुरुष ] का यदि नाश [ मृत्यु आदि ] हो जाता है, तो हो जाय, तथापि वह संसार में गुण ही [ माना जाता ] है ॥ १६ ॥

टीका--शरणागतरक्षणे स्वप्राणपरित्यागमपि श्रेयस्करमेव मत्वा--भीतेति । भीताय भयाक्रान्ताय, अभयप्रदानम्=अभयस्य प्रदानम्, ददतः=समर्पयतः, परोपकारे=परेषां हितसाधने, रसिकस्य=अनुरागवतः, पुरुषस्य इति शेषः, यदि=चेत्, नाशः=विनाशः, मृत्युरिति भावः, भवति=जायते, भवतु=जायताम्, तथापि=एवं सत्यपि, लोके=संसारे, गुणः=कीर्तिः, एव । पररक्षणे यदि कस्यापि मृत्युर्भवति सोऽपि संसारे यशोवर्धक एवास्ति अतोऽत्रार्यरक्षणे मम मृत्युरपि स्यादिति न मे चिन्तेति भावः । आर्या वृत्तम् ॥ १६ ॥

**विमर्श--**भयभीत को शरणदेने में कभी कभी अपने से अधिक बलशाली और सम्पन्न के साथ शत्रुता हो जाने पर मृत्यु की भी सम्भावना हो जाती है । किन्तु उसकी निन्दा नहीं अपितु प्रशंसा ही की जाती है ॥ १९ ॥

अर्थ--( घबड़ाहट के साथ उतर कर ) मैंने आर्य को देख लिया ( ऐसा आधा कह कर ) नहीं, आर्या वसन्तसेना को देख लिया । वह कह रही है--'यह उचित नहीं है, यह [ मेरी प्रतिष्ठा के ] योग्य नहीं है, जो कि आर्य चारुदत्त के पास अभिसार के लिये जाती हुये, मुझे मार्ग में अपमानित किया जा रहा है ।

वीरक--चन्दनक ! यहाँ मुझे सन्देह उत्पन्न हो गया है ।