मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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अथवा साहसस्य तावदनवसरः । ( चन्दनको नाट्येन प्रवहणमारुह्यावलोकयति । ) आर्यकः— शरणागतोऽस्मि । चन्दनकः— ( संस्कृतमाश्रित्य ) अभयं शरणागतस्य । आर्यकः—
त्यजति किल तं जयश्रीर्जहाति च मित्राणि बन्धुवर्गश्च । भवति च सदोपहास्यो यः खलु शरणागतं त्यजति ॥ १८ ॥
विमर्श— शस्त्रहीन आर्यक भीमसेन के समान बाहुयुद्ध करना उचित समझता है। फिर सोचता है कि अकेला क्या कर सकेगा, तब लड़ते हुये मौत ही श्रेयस्कर समझता है, जेलखाने में कैद होकर सड़ते हुये जीवित रहना या मरना अच्छा नहीं समझता है ॥ १७ ॥
अर्थ— अथवा साहस ( प्रदर्शन ) का यह [ उचित ] अवसर नहीं है ।
चन्दनक— ( अभिनय के साथ गाड़ी पर चढ़कर देखता है । )
आर्यक— मैं [ आपकी ] शरण में आया हूँ ।
चन्दनक— (संस्कृत भाषा में) शरण में आये हुये को अभय प्रदान करता हूँ ।
अन्वयः— यः शरणागतम्, त्यजति, तम्, जयश्रीः, खलु, त्यजति, मित्राणि, बन्धुवर्गः च, किल, जहाति, सदा, च, उपहास्यः, भवति ॥ १८ ॥
शब्दार्थ— यः=जो व्यक्ति, शरणागतम्=शरण में आये हुये को, त्यजति=छोड़ देता है, तम्=ऐसे व्यक्ति को, जयश्रीः=विजयलक्ष्मी, खलु=निश्चितरूप से, त्यजति=छोड़ देती है; मित्राणि=मित्रलोग, च=और, बन्धुवर्गः=भाई बन्धुजन, किल=निश्चितरूप से, जहाति=छोड़ देते हैं, च=और, सदा=सदैव, उपहास्यः=उपहास के योग्य, भवति=होता है ॥ १८ ॥
अर्थ—आर्यक— जो व्यक्ति शरण में आये हुये को छोड़ देता है [ अर्थात् उसकी रक्षा नहीं करता है ] उस व्यक्ति को विजयलक्ष्मी छोड़ देती है, और मित्र तथा बन्धुबान्धव भी छोड़ देते हैं, वह सदैव उपहास का पात्र होता है ॥ १८ ॥
टीका— शरणागतस्य परित्यागे रक्षणाभावे च दोषमाह चन्दनकः— त्यजतीति । यः=यः कश्चित् जनः, शरणागतम्=शरणे=आश्रये समागतम्, त्यजति=जहाति, तम्=तादृशं शरणागतपरित्यागिनम् जनम्, जयश्रीः=विजयलक्ष्मीः, खलु=निश्चयेन, त्यजति=परिहरति, मित्राणिः=सखायः, च=तथा, बन्धुवर्गः=बान्धवजनसमूहः, किल = निश्चयेन, जहाति=परित्यजति, ओहाक् त्यागे इति जुहोत्यादिः । सदा = सर्वकालम्, उपहास्यः = उपहासयोग्यः, भवति=जायते । एवञ्च शरणागतपरित्यागे विविधदूषणानि सन्तीति तत्परित्यागो न करणीय इति भावः । समुच्चयालंकारः, आर्या वृत्तम् ॥ १८ ॥