भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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षष्ठोऽङ्कः ४०३

त्वं प्रलोकयसि, कस्त्वम् ? )
**वीरकः—**अरे तुमं पि को ? ( अरे त्वमपि कः ? )
**चन्दनकः—**पूइज्जन्तो माणिज्जन्तो तुमं अप्पणो जादिं ण सुमरेसि । ( पूज्यमानो मान्यमानस्त्वमात्मनो जातिं न स्मरसि ? )
वीरकः—( सक्रोधम् ) अरे ! का मह जादी ? ( अरे ! का मम जातिः ? )
**चन्दनकः—**को भणउ ? ( को भणतु ? )
**वीरकः—**भणउ ! ( भणतु । )
**चन्दनकः—**अहवा ण भणामि । ( अथवा न भणामि । )

जाणन्तो वि हु जादिं तुज्झ अ ण भणामि सील-विहवेण ।
चिट्ठउ महच्चिअ मणे किं हि कहित्थेण भग्गेण ॥ २१ ॥
( जानन्नपि खलु जातिं तव च न भणामि शीलविभवेन ।
तिष्ठतु ममैव मनसि किं हि कपित्थेन भग्नेन ॥ २१ ॥)


करता हूँ। ( प्रकट रूप में ) अरे वीरक ! मुझ चन्दनक के द्वारा देखे गये को फिर तुम भी देखोगे, तुम कौन हो ( दुबारा देखने वाले ) ?

**वीरक—**तुम भी कौन हो ?

**चन्दनक—**पूजनीय और सम्माननीय तुम अपनी जाति को नहीं याद करते हो ?

वीरक—( क्रोध के साथ ) अरे ! मेरी क्या जाति है ?

**चन्दनक—**कौन बताये ?

वीरक—[ तुम्हीं ] बताओ ।

**चन्दनक—**नहीं, मैं नहीं बताऊँगा ।

**अन्वयः—**तव जातिम्, खलु, जानन्, अपि, शीलविभवेन, न, भणामि, मम, मनसि, एव, [ सा ], तिष्ठतु, हि, कपित्थेन, भग्नेन, किम् ॥ २१ ॥

**शब्दार्थ—**तव=तुम्हारी, जातिम्=जातिको, खलु=निश्चितरूप से, जानन्=जानता हुआ, अपि=भी, शीलविभवेन=अच्छे स्वभाव के कारण, न=नहीं, भणामि=कह रहा हूँ, मम=मेरे, मनसि=मन में, एव=ही, [ सा=वह तुम्हारी जाति ] तिष्ठतु = रहे, कपित्थेन = कैंथा फल को, भग्नेन = तोड़ देने से, किम् = क्या लाभ ? ॥ २१ ॥

**अर्थ—**तुम्हारी जाति को जानता हुआ भी अपने अच्छे स्वभाव के कारण नहीं कह रहा हूँ, वह [ तुम्हारी जाति ] मेरे मन में ही रहे, कैंथा को फोड़ने से क्या लाभ ? [ तुम्हारी जाति बताने से कोई लाभ नहीं है । ] ॥ २१ ॥