भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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षष्ठोऽङ्कः ४०७

विश्वस्तो राजाज्ञर्पित कुर्वन् सहसा केशेषु गृहीत्वा पादेन ताडितः । तत् शृणु रे ! अधिकरणमध्ये यदि ते चतुरङ्गं न कल्पयामि, तदा न भवामि वीरकः । )

चन्दनकः--अरे राअउलं अहिअरणं वा वच्च । किं तुए सुअण-सरि-सेण ? ( अरे ! राजकुलमधिकरणं वा व्रज । किं त्वया शुनकसदृशेन ? )

वीरकः--तह । ( तथा ) ( इति निष्क्रान्तः । )

चन्दनकः--( दिशोऽवलोक्य ) गच्छ रे पवहणवाहआ गच्छ। जइ को वि पुच्छेदि, तदो भणसि 'चन्दनअ-वीरएहि अवलोइदं पवहणं बज्जइ । अज्जे वसन्तसेणे ! इमं च अहिण्णाणं दे देमि । (गच्छ रे प्रवहण-वाहक ! गच्छ । यदि कोऽपि पृच्छति, ततो भणिष्यसि 'चन्दनक—वीरकाभ्याम् अवलोकितमिदं प्रवहणं व्रजति ।' आर्ये वसन्तसेने ! इदञ्च अभिज्ञानं ते ददामि ।) ( इति खड्गं प्रयच्छति । )

आर्यकः--( खड्गं गृहीत्वा सहर्षमात्मगतम् । )

अये ! शस्त्रं मया प्राप्तं स्पन्दते दक्षिणो भुजः । अनुकूलञ्च सकलं हन्त संरक्षितो ह्यहम् ॥ २४ ॥


पीटा है । तो सुन ले अरे ! न्यायालय के बीच में यदि तेरे चतुरङ्ग न करवा दूं तो मेरा नाम वीरक नहीं है ।

चन्दनक—अरे ! राजा के घर अथवा न्यायालय कहीं भी जाओ । कुत्ते के समान तुमसे [ मुझे ] क्या [ डर ] ?

वीरक—अच्छी बात है । ( यह कहकर चला जाता है । )

चन्दनक—( चारो ओर देखकर ) जाओ अरे गाड़ीवान ! जाओ, [ मार्ग में ] यदि कोई पूछे तो कह देना—'चन्दनक और वीरक के द्वारा देखी गई यह गाड़ी जा रही है।' आर्ये वसन्तसेने ! यह पहचान (प्रमाण) तुम्हें देता हूँ । ( ऐसा कहकर तलवार देता है । )

अन्वयः—अये !, मया, शस्त्रम्, प्राप्तम्, दक्षिणः, भुजः, स्पन्दते, सकलम्, अनुकूलम्, हन्त ! अहम्, हि, रक्षितः ॥ २४॥

शब्दार्थ—अये !=अरे, मया = मैंने, शस्त्रम् = शस्त्र, प्राप्तम्=पा लिया है, दक्षिणः=दाहिना, भुजः=हाथ, स्पन्दते=फड़क रहा है, सकलम्=सभी कुछ, अनुकूलम्=अनुकूल, सहायक है, हन्त !=ओह, अहम्=मैं आर्यक, हि=निश्चितरूप से, संरक्षितः=बचा लिया गया हूँ ॥ २४ ॥

अर्थआर्यक--( तलवार लेकर हर्ष के साथ अपने आप में )

अरे ! मैंने शस्त्र प्राप्त कर लिया है, [ मेरा ] दाहिना हाथ फड़क रहा है; सभी कुछ अनुकूल है, ओह ! मैं बचा लिया गया हूँ ॥ २४ ॥