भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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४१० | मृच्छकटिकम्

( अभयं तव ददातु हरो विष्णुर्ब्रह्मा रविश्च चन्द्रश्च ।
हत्वा शत्रुपक्षं शुम्भनिशुम्भो यथा देवी ॥ २७ ॥ )
( चेटः प्रवहणेन निष्क्रान्तः । )

चन्दनकः—( नेपथ्याभिमुखमवलोक्य ) अरे ! णिक्कमन्तस्म से पिअव-अस्यो सव्विलओ पिट्ठंतदो ज्जेव अणुलग्गो गदो। भोदु, पधाणदण्डधारओ वीरओ राअ-पच्चअ-आरो विरोधिदो। ता जाव अहं पि पुत्त-भादु-पड़ि-

शब्दार्थ—हरः=शंकर, विष्णुः=विष्णु, ब्रह्मा=ब्रह्मा, रविः=सूर्य, च=और, चन्द्रः=चन्द्रमा, तव=तुम्हें, आर्यक को, अभयम्=अभय, ददातु=प्रदान करें; शुम्भनिशुम्भौ=शुम्भ और निशुम्भ राक्षसों को, हत्वा=मारकर, देवी=दुर्गा ने, यथा=जैसे विजय प्राप्त की, ( तथैव = उसी प्रकार ), शत्रुपक्षम्=शत्रुपक्ष को, [ हत्वा=मारकर, विजयस्व=विजय प्राप्त करो ] ॥ २७ ॥

अर्थ--चन्दनक--
शंकर, विष्णु, ब्रह्मा, सूर्य और चन्द्रमा तुम्हें अभयदान दें । शुम्भ और निशुम्भ को मारकर देवी ने जिस प्रकार विजय प्राप्त की उसी प्रकार शत्रुपक्ष को मारकर तुम भी विजय प्राप्त करो ॥ २७ ॥

टीका—चन्दनकः आर्यकस्य विजयाय आशीर्वादंददाति—हर इति। हरः=शिवः, विष्णुः=लक्ष्मीपतिः, ब्रह्मा=जगत्-सृष्टिकर्ता, रविः=सूर्यः, चन्द्रः=निशाकरः, च, तव=तुभ्यम्, आर्यकायेति भावः, अभयम्=भय|भावम्, ददातु=प्रयच्छतु, शुम्भनिशुम्भौ=एतन्नामानौ, राक्षसौ, हत्वा=मारयित्वा, देवी=दुर्गा, यथा=यदवत्, तथैव=तद्वत्, शत्रुपक्षम्=पालकराजः सम्बन्धिनम्, हत्वा=विनाश्य, त्वं विजयस्व । तुल्ययोगिता-लंकारः, आर्या वृत्तम् ॥ २७ ॥

विमर्श—प्रसन्न होकर चन्दनक आशीर्वाद देता है । जिस प्रकार दुर्गा ने शुम्भ निशुम्भ दोनों राक्षसों का संहार करके शान्ति-स्थापना की थी उसी प्रकार दुष्ट पालक राजा का संहार करके तुम भी शान्तिस्थापना के लिये राज्य-भार प्राप्त कर लो। यहां तुल्ययोगिता अलंकार है और आर्या छन्द है ॥ २७ ॥
( चेट गाड़ी के साथ चला जाता है । )

शब्दार्थ—निष्क्रामतः=निकलते हुये ही इसके, अनुलग्नः=पीछे-पीछे लग गया, प्रधानदण्डकारकः = प्रमुख दण्ड देनेवाला, राजप्रत्ययकारी = राज का विश्वस्त, विरोधितः=विरोधी बना दिया गया, एतम् = इस शर्विलक के, अनुगच्छामि=पीछे जा रहा हूँ।

अर्थ--चन्दनक-- ( नेपथ्य की ओर देखकर ) अरे, निकलते ही आर्यक के पीछे मेरा प्रिय मित्र शर्विलक लगा हुआ चला गया है। बच्चा, राजा के विश्वास-