भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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४१४ मृच्छकटिकम्

बैलों को चलने के लिये प्रेरित करता हुआ, हांकता हुआ, स्वच्छन्दम्=धीरे-धीरे, आगच्छति किम्=आ रहा है क्या ? ॥ २ ॥

अर्थ - चारुदत्त - तो देर क्यों कर रहा है ?

क्या इस [ वर्धमानक की गाड़ी ] के आगे दूसरी गाड़ी धीरे-धीरे जा रही है, उसका अवकाश=खाली रास्ता ढूंढ़ रहा है ? अथवा धुरा टूट जाने पर उसे बदल रहा है ? अथवा लगाम की रस्सी टूट गयी है ? अथवा रास्ते के बीच में पेड़ आदि लकड़ी रख देने से इसका गमन रुक गया है अतः दूसरे रास्ते की प्रार्थना कर रहा है ? अथवा धीरे-धीरे बैलों की जोड़ी को हांकता हुआ अपनी इच्छा से धीरे-धीरे आ रहा है ? ॥ २ ॥

टीका-प्रवहणस्य विलम्बेनागमने हेतुमुत्प्रेक्षते—किमिति। किम्=इदं जिज्ञासायाम्, अस्य=वर्धमानस्य शकटस्य, पुरः=अग्रे, प्रवहणम्=अन्यत् शकटम्, शनैः=मन्दंमन्दम्, याति=व्रजति, तस्य=अग्रेगामिनः शकटस्य, अन्तरम्=अग्रे गमनायावकाशम्, मार्गति=अन्विष्यति ? अक्षे=कूबरे, भग्ने=त्रुटिते, विकृते वा, परिवर्तनम्=विनिमयम्, तदपाकृत्यान्यसंयोजनमित्यर्थः, कुरुते=करोति ?, अथवा विकल्पार्थकमव्ययम्, प्रग्रहः=वृषभादीनां नियन्त्रणरज्जुः, छिन्नः=त्रुटितो, भग्नो वा, अथवा, वर्त्मनः=मार्गस्य, अन्ते=प्रान्तभागे, मध्यभागे इति भावः, उज्झितानि=पातितानि यानि दारूणि तैः वारिता = निवारिता गतिः=गमनं यस्य तादृशः, राजाज्ञया गमनागमनावरोधाय मार्गे दार्व्वादिकं निपात्य मार्गस्यावरोधः कृत इति भावः, कुत्रचित् कर्मान्तोञ्झितेत्यादिपाठः, कर्मान्तः = राजादिनियोगः, मार्गान्तरम् अन्यं पन्थानम्, याचते = प्रार्थयते, अन्विष्यतीति भावः, अथवा, स्वैरम्=मन्दंमन्दम्, प्रेरितम्=सञ्चालितम्, गोयुगम् = बलीवर्दद्वयम्, येन तादृशः, सन्, स्वच्छन्दम्=यथेच्छम्, शनैः शनैरिति भावः, आयाति=आगच्छति । एवञ्च विलम्बमसहमानश्चारुदत्तोऽनेक-संकल्प-विकल्पान् कल्पयति । अत्र सन्देहालंकारः, शार्दूलविक्रीडितं वृत्तम् ॥ २ ॥

विमर्श—वसन्तसेना को लेकर वर्धमानक नहीं आ सका। इसके विलम्ब के लिये चारुदत्त तरह-तरह की शंकायें करता है। वर्त्मान्तोञ्झितदारुवारितगतिः--- इसके स्थान पर कर्मान्तोञ्झितदारुवारितगतिः---यह पाठ भी है। कभी-कभी यातायात रोकने के लिये मार्ग के मध्यभाग में बड़ी-बड़ी लकड़ी के लट्ठे आदि रख दिये जाते हैं। यहाँ 'याचते' क्रियापद महत्त्वपूर्ण है। चारुदत्त सोचता है कि कहीं सभी रास्ते बन्द न कर दिये गये हों, अतः वर्धमानक किसी अन्य सुरक्षित रास्ते से जाने की प्रार्थना कर रहा होगा। अनेक सन्देह होने से सन्देहालंकार है। शार्दूलविक्रीडित छन्द है ॥ २ ॥