मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४१६ मृच्छकटिकम्
अहो ! नगरात् सुदूरमपक्रान्तोऽस्मि । तत् किमस्मात् प्रवहणादवतीर्य वृक्षवाटिकागहनं प्रविशामि ? उताहो प्रवहणस्वामिनं पश्यामि ? अथवा कृतं वृक्षवाटिकागहनेन । अभ्युपपन्नवत्सलः खलु तत्रभवानार्यचारुदत्तः श्रूयते; तत् प्रत्यक्षीकृत्य गच्छामि ।
स तावदस्माद्व्यसनार्णवोत्थितं निरीक्ष्य साधुः समुपैति निर्वृतिम् ।
शरीरमेतत् गतमीदृशीं दशां धृतं मया तस्य महात्मनो गुणैः ॥ ४ ॥
विमर्श- भीतभीतः-एक शब्द के प्रयोग से उतना अधिक अर्थ नहीं निकलता है, 'आबाधे च' पा. सू. ८।१।१० से द्वित्व किया गया है । सावशेषापसारः-लम्बी अवधि तक पैर जकड़े रहने के कारण भागने में कठिनाई होने से इच्छानुसार भागना सम्भव नहीं है । वायसीभिः रक्षितः---यह प्रसिद्धि है कि कोयल अपना अण्डा कौवा के घोसले में रख देती है कौवी भ्रमवश अपना अण्डा समझकर उसकी रक्षा करती हुई पालन-पोषण करती रहती है । आर्यक अपने को भी उसी प्रकार समझ रहा है । क्योंकि वह गाड़ी चारुदत्त की है, अतः उसमें वह या उसके सम्बन्धी ही बैठे होंगे । इस कारण आर्यक की रक्षा होती जा रही है । वह सुरक्षित चला जा रहा है । यहाँ उपमा अलंकार है और मालिनी छन्द है ॥ ३ ॥
अर्थ- ओह ! नगर से बहुत दूर निकल आया हूँ । तो क्या इस गाड़ी से उतर कर घने पेड़ों के समूह में चला जाऊँ, अथवा गाड़ी के स्वामी चारुदत्त का दर्शन कर लूं । अथवा घने वृक्षों के समूह में जाना व्यर्थ है । माननीय चारुदत्त शरणागतों की रक्षा करने वाले हैं, ऐसा सुना जाता है । अतः उनका दर्शन करके ही जाऊँगा ।
**टीका-**सुदूरम्=बहुदूरम्, अपक्रान्तः=अपसृतः, वृक्षवाटिकाभिः=वृक्षसमूहैः, गहनम् = गभीरम्, संकुलम्, प्रविशामि=आत्मरक्षार्थं व्रजामि, उताहो=अथवा, प्रवहणस्य स्वामिनम्=चारुदत्तम्, वृक्षवाटिकागहनेन तत्र प्रवेशेन, कृतम्=न किमपि फलम् इत्यर्थः, अभ्युपपन्नेषु=शरणागतेषु वत्सलः=पालकः, प्रत्यक्षीकृत्य=अवलोक्य, गच्छामि=अस्मात् स्थानात् अन्यत्रात्मरक्षार्थं ब्रजिष्यामीत्यर्थः ।
**अन्वयः-**साधुः, सः, अस्मात्, व्यसनार्णवोत्थितम्, [ माम् ] निरीक्ष्य, निर्वृतिम्, समुपैति, तावत्, ईदृशीम्, दशाम्, गतम्, एतत्, शरीरम्, मया, तस्य, महात्मनः, गुणैः, धृतम् ॥ ४ ॥
**शब्दार्थ-**साधुः=सज्जन, सः=वे चारुदत्त, अस्मात्=इस, पूर्वोक्त स्वभाव के कारण, व्यसनार्णवोत्थितम्=विपत्तिरूपी सागर से निकले हुये, माम्=मुझ आर्यक को, निरीक्ष्य=देख कर, निर्वृतिम् = सुख, आनन्द को, उपैति=प्राप्त करेंगे, तावत्= यह वाक्यालंकार के लिये है, ईदृशीम्=इस प्रकार की, दशाम्=अवस्था को, गतम्=