मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
पृष्ठ 505, कुल 760 में से
संदर्भ में पढ़ेंसप्तमोऽङ्कः ४१७
चेटः-—इमं तं उज्जाणं, ता जाव उवशप्पामि । ( उपसृत्य ) अज्ज मित्तेअ ! । ( इदं तदुद्यानम्, तद् यावदुपसर्पामि । ) ( आर्य मैत्रेय ! )
विदूषकः-—भो ! पियं दे णिवेदेमि, वड्ढमाणओ मन्तेदि, आगदाए वसन्तसेणाए होदव्वं ( भोः ! प्रियं ते निवेदयामि, वर्द्धमानको मन्त्रयति, आगतया वसन्तसेनया भवितव्यम् । )
प्राप्त हुआ, एतत् = यह, शरीरम् = शरीर, तस्य = उस, महात्मनः = महापुरुष के, गुणैः = गुणों के कारण, धृतम् = धारण किया हुआ है ॥ ४ ॥
अर्थ—वे सज्जन [ चारुदत्त ] इस अपने स्वभाव से, विपत्तिरूपी समुद्र से पार निकले हुये मुझको देखकर सुख प्राप्त करेंगे, प्रसन्न होगें। इस प्रकार की दशा को प्राप्त हुआ यह शरीर उसी महापुरुष के गुणों के कारण धारण किया हुआ है, [ अन्यथा समाप्त कर दिया जाता । ] ॥ ४ ॥
टीका—साधुः = सज्जनः, सः = चारुदत्तः, अस्मात् = शरणागतवात्सल्यात्, व्यसनम् = कारागारादौ बन्धनम् एव अर्णवः = सागरः, तस्मात् उत्थितम् = बहिर्भूतम्, सुरक्षितम्, [ माम् = आर्यकम् ], निरीक्ष्य = विलोक्य, निर्वृतिम् = आनन्दम्, समुपैति = प्राप्स्यति, वर्तमानसामीप्यात् भविष्यति लट्, ईदृशीम् = पूर्वानुभूताम्, दशाम् = अवस्थाम्, गतम् = प्राप्तम्, एतत् = इदम्, शरीरम् = कायः, महात्मनः = महापुरुषस्य, तस्य = चारुदत्तस्य, गुणैः = परोपकारादिसद्गुणैः, धृतम् = त्रातम्, महापुरुषस्य तस्य याने समारोहणेनैव मम शरीरमेतावत्कालपर्यन्तं सुरक्षितं वर्ततेऽन्यथा राजपुरुषादिभिः गृहीत्वा कारागारादौ बद्धं स्यादिति भावः । वंशस्थबिलं वृत्तम् ॥ ४ ॥
विमर्श—इस श्लोक में 'अस्मात्' इसका अर्थ सन्दिग्ध है । सामान्यतया इसको 'व्यसनार्णव' का परामर्शक माना गया है परन्तु ऐसा मानने पर व्याकरण-शास्त्रानुसार समास होना कठिन है क्योंकि 'साकाङ्क्ष' का समास नहीं होता है । इस स्थिति में इसका अर्थ पूर्वोक्त 'अभ्युपपन्नवत्सलत्व' के साथ करना चाहिये- ऐसा कुछ लोग कहते हैं । परन्तु अर्थ के औचित्य को ध्यान में रखने पर इसको 'व्यसनार्णव' का ही परामर्शक मानना चाहिये । जैसे कुछ विशेष उदाहरणों में साकाङ्क्षता में भी समास हुये हैं, वैसा ही यहाँ भी मान लेना चाहिये ॥ ४ ॥
अर्थ चेट—यही वह बगीचा है, तो वहीं चलता हूँ। ( पास जाकर ) आर्य मैत्रेय !
विदूषक—मित्र, मित्र, आपको शुभ समाचार बता रहा हूँ । वर्धमानक पुकार रहा है । वसन्तसेना आ गई होगी ।
२७ मृ०