मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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चारुदत्तः—प्रियं नः प्रियम् ।
विदूषकः—दासीए पुत्ता ! किं चिरइदोसि ? (दास्याः पुत्र ! किं चिरायितोऽसि ?).
चेटः—अज्ज मित्तेअ ! मा कुप्प, जाणत्थलके विशुमलिदे त्ति कदुअ गदागदिं कलेन्ते चिलइदेम्हि । (आर्य मैत्रेय ! मा कुप्य, यानास्तरणं विस्मृतमिति कृत्वा गतागतिं कुर्वन् चिरायितोऽस्मि ।)
चारुदत्तः—वर्द्धमानक ! परिवर्त्तय प्रवहणम् । सखे मैत्रेय ! अवतारय वसन्तसेनाम् ।
विदूषकः—किं णिअडेण वद्धा से गोडा जेण सअं ण ओदरेदि । (उत्थाय प्रवहणमुद्घाट्य) भोः ! ण वसन्तसेणा, वसन्त-सेणो क्खु एसो । (किं निगडेन बद्धावस्याः पादौ येन स्वयं नावतरति ।) (भोः न वसन्तसेना, वसन्तसेनः खल्वेषः ।)
चारुदत्तः—वयस्य ! अलं परिहासेन, न कालमपेक्षते स्नेहः । अथवा स्वयमेवावतारयामि । (इत्युत्तिष्ठति)
आर्यकः—(दृष्ट्वा) अये ! अयमेव प्रवहणस्वामी । न केवलं श्रुतिरमणीयो दृष्टिरमणीयोऽपि । हन्त ! रक्षितोऽस्मि ।
चारुदत्तः—(प्रवहणमधिरुह्य दृष्ट्वा च) अये ! तत् कोऽयम् ?
'करिकर-समबाहुः सिंहपीनोन्नतांसः
पृथुतर-सम-वक्षास्ताम्रलोलायताक्षः ।
चारुदत्त--प्रिय है, हमारे लिये प्रिय है ।
विदूषक—दासी के बच्चे ! क्यों देर कर दी ?
चेट—आर्य मैत्रेय ! मत नाराज होइये । गाड़ी का बिछावन भूल गया था इसलिये आना जाना करने में देर हो गयी ।
चारुदत्त—वर्धमानक गाड़ी घुमाओ । मित्र मैत्रेय ! वसन्तसेना को उतारो ।
विदूषक—क्या इसके पैर बेड़ी से बंधे हैं जो यह स्वयं नहीं उतर पा रही है। (उठ कर, गाड़ी खोलकर) अरे ! यह वसन्तसेना नहीं है, यह तो वसन्तसेन है ।
चारुदत्त—मित्र हंसी मत करो । प्रेम समय का विलम्ब नहीं चाहता है । अथवा मैं स्वयं ही उतारता हूँ । (यह कह कर उठता है ।)
आर्यक—(देखकर) अरे ! ये ही गाड़ी के स्वामी हैं । ये केवल सुनने में ही अच्छे नहीं हैं अपि तु देखने में भी अच्छे लगते हैं । अहो ! अब (मेरी) रक्षा हो गयी ।
अन्वयः—करिकरसमबाहुः, सिंहपीनोन्नतांशः, पृथुतरसमवक्षाः, ताम्रलोलाय-