मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसप्तमोऽङ्कः ४१९
कथमिदमसमानं प्राप्त एवंविधो यो
वहति निगडमेकं पादलग्नं महात्मा ॥ ५ ॥
ततः को भवान् ?
आर्यकः — शरणागतो गोपालप्रकृतिरार्यकोऽस्मि ।
ताक्षः, एवंविधः, महात्मा [ अस्ति, सः ] कथम्, इदम्, असमानम्, [ दण्डम् ], प्राप्तः, पादलग्नम्, एकम्, निगडम्, वहति ॥ ५ ॥
शब्दार्थ — करिकर-समबाहुः = हाथी की सूँड़ के समान भुजाओं वाला, सिंहपीनोन्नतांशः=शेर के समान मोटे और ऊँचे कन्धों वाला, पृथुतरसमवक्षाः=विशाल और समतल वक्षस्थलवाला, ताम्रलोलायताक्षः=ताम्बें के समान, चञ्चल और बड़ी-बड़ी आंखोंवाला, यः=जो, एवंविधः=इस प्रकार का महात्मा=महापुरुष है वह, कथम्=कैसे, इदम समानम्=इस प्रकार के अनुचित [ दण्ड ] को, प्राप्तः=प्राप्त कर, पादलग्नम्=पैर में लटकी हुई एक, निगडम्=बेड़ी को, वहति=ढो रहा है, धारण किये हुये है ॥ ५ ॥
अर्थ —चारुदत्त--( गाड़ी पर चढ़कर और देखकर ) अरे, तो यह कौन है ?
हाथी की सूँड़ के समान विशाल भुजाओं वाला, शेर के समान ऊँचे और मोटे कन्धों वाला, विशाल और समतल वक्षस्थलवाला, ताम्बें के समान रंगवाले चञ्चल और विशाल नेत्रों वाला जो इस प्रकार का महापुरुष है वह कैसे इस प्रकार के अनुचित दण्ड को प्राप्त करके पैर में लगी हुई एक बेड़ी को ढो रहा है, धारण किये हुये है ॥ ५ ॥
तब आप कौन हैं ?
टीका — आर्यकस्य स्वरूपं बन्धनं च विलोक्य चारुदत्त उत्प्रेक्षते—करिकरेति । करिणः=गजस्य करेण=शुण्डादण्डेन समौ=तुल्यौ बाहू=भुजौ यस्य तादृशः, सिंहस्य=मृगाधिपस्य इव पीनो = परिपुष्टौ, उन्नतौ = उच्छ्रितौ च अंशौ = स्कन्धौ यस्य तादृशः, पृथुतरम्=अतिविशालम् समम्=अनुच्चनीचम्, वक्षः=उरःस्थलं यस्य सः, ताम्रे =ताम्रवर्णे, लोले=चञ्चले, आयते=आयताकारे विशाले इत्यर्थः, अक्षिणी=नेत्रे यस्य तादृशः, सः=पुरोदृश्यमानः, एवंविधः=पूर्वोक्तवैशिष्ट्ययुक्तः, महात्मा=महापुरुषः, अस्ति, सः, कथम् = कस्मात् कारणात्, इदम्=पुरो दृश्यमानम्, अंसमानम् = अयोग्यम् अनुचितं बन्धनम्, प्राप्तः = उपगतः, सन्, पादलग्नम्=चरणनिबद्धम् एकम्, निगडम्=शृङ्खलाम्, वहति=धारयति । एवंविध-महापुरुष-लक्षणवत इदं बन्धनमाश्चर्यकरमिति भावः । लुप्तोपमालंकारः । मालिनी वृत्तम् ॥ ५ ॥
अर्थ—आर्यक--शरण में आया हुआ, अहीर का पुत्र आर्यक हूँ ।