भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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सप्तमोऽङ्कः ४२१

आर्यकः--स्नेहमयान्यन्यानि दृढंतराणि दत्तानि । विदूषकः--सङ्कच्छेहि णिअडाइं, एसो वि मुक्को, सम्पंदं अम्हे वज्जि- स्सामो । ( सङ्कच्छस्व निगडानि, एषोऽपि मुक्तः, साम्प्रतं वयं व्रजिष्यामः । ) चारुदत्तः धिक् शान्तम् । आर्यकः--सखे चारुदत्त ! अहमपि प्रणयेनेदं प्रवहणमारूढः । तत् क्षन्तव्यम् । चारुदत्तः--अलङ्कृतोऽस्मि स्वयंग्राहप्रणयेन भवता । आर्यकः--अभ्यनुज्ञातो भवता गन्तुमिच्छामि । चारुदत्तः--गम्यताम् । आर्यक :--भवतु, अवतरामि । चारुदत्तः--सखे ! नावतरितव्यम् । प्रत्यग्रापनीतसंयमनस्य भवतः अलघुसंचारा गतिः । सुलभपुरुषसञ्चारेऽस्मिन् प्रदेशे प्रवहणं विश्वास- मुत्पादयति, तत् प्रवहणेनैव गम्यताम् । आर्यकः--यथाह भवान् ।


आर्यक--प्रेममयी दूसरी बेड़ियां डाल दीं ।

विदूषक--( चारुदत्त के पैर में ) बेड़ियां डाल दो । यह भी छूट गया । अब हम लोग ( कारागार ) चलेंगे ।

चारुदत्त--ऐसी बात को धिक्कार है । शान्त रहो ।

आर्यक--मित्र चारुदत्त ! मैं भी प्रेम के कारण ही इस गाड़ी पर चढ़ा । अतः क्षमा करिये ।

चारुदत्त--आपके द्वारा स्वयं इस गाड़ी पर चढ़ने के स्नेह से मैं अलंकृत हो गया हूँ ।

आर्यक--आपसे आज्ञा लेकर जाना चाहता हूँ ।

चारुदत्त--जाइये ।

आर्यक--अच्छा, उतरता हूँ ।

चारुदत्त--मित्र ! मत उतरो । अभी अभी बेड़ी हटाने से आपकी गति तेज नहीं है ( अर्थात् आप जल्दी जल्दी नहीं चल पायेंगे । ) राजपुरुषों के आवा- गमन से युक्त इस स्थान पर ( मेरी ) गाड़ी विश्वास उत्पन्न कराती है, इसलिये गाड़ी से ही जाइये ।

आर्यक--आप की जैसी आज्ञा ।

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