भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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अष्टमोऽङ्कः ४३१

भिक्षुः—शाभदं। पशोददु उवाशके। (स्वागतम्, प्रसीदतु उपासकः।)

शकारः—भावे! पेक्ख, पेक्ख, आक्क्रोशदि मं। (भाव! प्रेक्षस्व प्रेक्षस्व, आक्रोशति माम्।)

विटः—किं ब्रवीति?

शकारः—उवाशके त्ति मं भणादि। किं हग्गे णाविदे? (उपासक इति मां भणति। किमहं नापितः?)

विटः—बुद्धोपासक इति भवन्तं स्तौति।

शकारः—थुणु, शमणका! थुणु। (स्तुहि श्रमणक! स्तुहि।)

भिक्षुः—तुमं धण्णे, तुमं पुण्णे। (त्वं धन्यः, त्वं पुण्यः।)

शकारः—भावे! धण्णे पुण्णे त्ति मं भणादि। किं हग्गे शलावके, कोष्टके, कोम्भकाले वा? (भाव! धन्यः पुण्य इति मां भणति। किमहं श्रावकः, कोष्ठकः, कुम्भकारो वा?)

विटः—काणेलीमातः! ननु धन्यस्त्वं पुण्यस्त्वमिति भवन्तं स्तौति।

शकारः—भावे! ता कीश एशे इध आगदे? (भाव! तत् केन एष इहागतः?)


भण्डारी या जुआरी, कुम्भकारः=कुम्हार, प्रवरम्=श्रेष्ठ, भगिनीपतिना=बहनोई, पुराणकुलत्थयूषशबलानि=पुरानी कुलथी के घोल के समान रंगवाली, दूष्यगन्धीनि=दुर्गन्धयुक्त, चीवराणि=वस्त्रों को, प्रक्षालयसि=धोते हो, अचिरप्रव्रजितेन=शीघ्र ही संन्यासी बना हुआ, एकप्रहारिकम्=एक ही प्रहार से समाप्त होने योग्य।

अर्थभिक्षु—आपका स्वागत है, उपासक प्रसन्न हो।

शकार—भाव (श्रीमन्)! देखो, देखो गाली दे रहा है।

विट—क्या कह रहा है?

शकार—मुझे उपासक [सेवक] ऐसा कह रहा है। क्या मैं नाई हूँ?

विट—बुद्ध के उपासक=सेवक—ऐसी स्तुति करता है।

शकार—स्तुति करो, स्तुति करो।

भिक्षु—तुम धन्य हो, तुम पुण्यवान् हो।

शकार—भाव! मुझे धन्य, पुण्य ऐसा कह रहा है। तो क्या मै स्तुति करने वाला चारण हूँ, या भण्डारी=जुआरी हूँ या कुम्हार हूँ?

विट—काणेली के बच्चे! 'तुम धन्य हो, पुण्यवान् हो' ऐसा कह कर तुम्हारी स्तुति करता है।

शकार—भाव! तो यह किस लिये यहाँ आया?