मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
पृष्ठ 532, कुल 760 में से
संदर्भ में पढ़ें| ४४४ | मृच्छकटिकम् |
|---|
चेटः—भीदे क्खु हग्गे। मज्झणिहके शुज्जे। मा दाणिं कुविदे लाअ-शाल-शण्ठाणे हुविशदि। ता तुलिदं वहामि। जाध, गोणा ! जाध। (भीत: खल्वहम्। माध्याह्निकः सूर्यः। मा इदानीं कुपितो राजश्यालसंस्थानो भविष्यति। तत् त्वरितं वहामि। यातम्, गावो ! यातम्।)
वसन्तसेना—हद्धी ! हद्धी ! ण क्खु वड्ढमाणअस्स अअं सरसंजोगो, किं ण्णेदं ? किं ण क्खु अज्जचारुदत्तेण वाहणपरिस्समं परिहरन्तेण अण्णो मणुश्शो अण्णं पवहणं पेसिदं भविस्सदि ? फुरदि दाहिणं लोअणं, वेवदि मे हिअअं, सुण्णाओ दिसाओ, सव्वं ज्जेव विसंठुलं पेक्खामि। (हा धिक् ! हा धिक् ! न खलु वर्द्धमानकस्यायं स्वरसंयोगः। किन्न्व इदम् ? किं खलु आर्यचारुदत्तेन वाहनपरिश्रमं परिहरता अन्यो मनुष्योऽन्यत् प्रवहणं प्रेषितं भविष्यति ? स्फुरति दक्षिणं लोचनम्, वेपते मे हृदयम्, शून्याः दिशः, सर्वमेव विसंष्ठुलं पश्यामि।)
शकारः—(नेमिघोषमाकर्ण्य) भावे ! भावे ! आगदे पवहणे। (भाव ! भाव ! आगतं प्रवहणम्।)
विटः—कथं जानासि ?
शकारः—किं ण पेक्खदि भावे ? बुद्धशूअले विअ घुलघुलाअमाणं लक्खीअदि। (किं न प्रेक्षते भावः ? वृद्धशूकर इव घुरघुरायमाणं लक्ष्यते।)
विटः—(दृष्ट्वा) साधु लक्षितम्। अयमागतः।
शकारः—पुत्तका थावलका, चेडा ! आगदे शि ? (पुत्रक, स्थावरक, चेट ! आगतोऽसि ?)
चेट—मैं डर रहा हूँ। दोपहर का सूरज है। इस समय राजश्याल संस्थानक नाराज न हो जाय। अतः शीघ्र ही गाड़ी ले चलता हूँ। चलो बैलो, चलो।
वसन्तसेना—हाय, हाय ! निश्चित ही यह वर्धमानक की आवाज नहीं है। यह क्या बात है ? क्या आर्य चारुदत्त गाड़ी और गाड़ीवान दोनों के परिश्रम को बचाते हुये [ अर्थात् उन्हें विश्राम देने के लिये ] दूसरा गाड़ी वाला व्यक्ति और दूसरी गाड़ी भेज दी है ? दाहिनी आँख फड़क रही है, मेरा हृदय कांप रहा है, सारी दिशायें शून्य हैं, सभी कुछ विपरीत दिखाई दे रहा है।
शकार – (गाड़ी के धुरे की आवाज सुनकर) भाव ! भाव ! गाड़ी आ गई।
विट—तुम कैसे जानते हो ?
शकार—श्रीमन् आप नहीं रहें हैं, बूढ़े सुअर के समान घुर घुर आवाज करती हुई मालूम पड़ रही है ?
विट – (देखकर) अच्छा समझा। यह आ गया।
शकार—बेटा, स्थावरक, चेट ! तुम आ गये हो ?