भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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४५६ | मृच्छकटिकम्

अले थावलआ, चेडा ! कहिं तुए एशा शमाशादिदा ? ( अरे स्थावरक ! चेट ! कस्मिन् त्वया एषा समासादिता । )

चेटः--भट्टके ! गाम-शअलएहिं लुद्धे लाअमग्गे, तदो चालुदत्तश्श लुक्खवाडिआए पवहणं थाविअ, तहिं ओदलिअ, जाव चक्कपलिबट्टिं कलेमि, ताव एशा पवहणविपज्जाशेण इह आलूढेत्ति तक्केमि । ( भट्टक ! ग्रामशकटैः रुद्धो राजमार्गः, तदा चारुदत्तस्य वृक्षवाटिकायां प्रवहण स्थापयित्वा तस्मिन्नवतीर्य, यावत् चक्रपरिवृत्तिं करोमि, तावदेषा प्रवहणविपर्ययेन इह आरूढेति तर्कयामि ।)

शकारः--कधं पवहण-विपज्जाशेण आगदा, ण मं अहिशालिदुं ? ता ओदल, ओदल मम केलकादो पवहणादो । तुमं तं दलिद्दशत्थवाहपुत्तकं अहिशा- लेशि, मम केलकाईं गोणाई वाहेशि ; ता ओदल ओदल गब्भदाशि ! ओदल ओदल । ( कथं प्रवहणविपर्ययेनागता, न मामभिसारयितुम् । तदवतर अवतर मदीयात् प्रवहणात् । त्वं तं दरिद्रसार्थवाह-पुत्रकमभिसारयसि, मदीयौ गावौ वाह- यसि; तदवतर अवतर गर्भदासि ! अवतर अवतर । )

वसन्तसेना--तं अज्जचारुदत्तं अहिसारेसि त्ति जं सच्चं अलङ्किदम्हि इमिणा वअणेण । सम्पदं जं भोदु, तं भोदु । ( तमार्थचारुदत्तमभिसारयसि इति यत् सत्यम् अलङ्कृतास्मि अनेन वचनेन । साम्प्रतं यद्भवतु तद्भवतु । )


ताडितमिति यावत् । एवञ्च तव कृत्यमतीवानुचितमिति बोध्यम् । उपमालङ्कारः, उपजातिवृत्तम् ॥ १६ ॥

**अर्थ—**अरे स्थावरक चेट ! यह तुम्हें कहाँ मिल गयी ।

**चेट—**स्वामिन् ! गाँव की गाड़ियों से जब रास्ता अवरुद्ध ( जाम ) हो गया था, तब चारुदत्त की वृक्षवाटिका ( बगीचा ) में गाड़ी खड़ी करके, वहाँ उतर कर जब तक पहिया बदलने लग गया, तब तक गाड़ी की अदला-बदली के कारण यह इस गाड़ी में बैठ गयी-ऐसा सोचता हूँ ।

**शकार—**क्या गाड़ी की अदलाबदली से यहाँ आ गई है, मेरे साथ अभिसार के लिये नहीं आई ? तो मेरी गाड़ी से उतर जा, उतर जा । तुम इस दरिद्र सार्थवाहपुत्र चारुदत्त के साथ अभिसार करती हो और मेरे बैलों को ( गाड़ी में अपने ले जाने के लिये ) जोतती हो । तो उतर जा, उतर जा, गर्भकाल से ही दासी ! उतर जा, उतर जा ।

वसन्तसेना—'उन चारुदत्त के साथ अभिसार करती हो' यह सच है तो इस कथन से अपने को विभूषित मानती हूँ । अब जो हो, सो हो ।