मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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विटः--ततः किम् ? शकारः--मम पिअं कलेहि । ( मम प्रियं कुरु । ) विटः--वाढं करोमि, वर्जयित्वा त्वकार्यम् । शकारः--भावे ! अकज्जाह गन्धे वि णत्थि, लक्खशो कावि णत्थि । ( भावः ! अकार्यस्य गन्धोऽपि नास्ति, राक्षसी कापि नास्ति ! ) विटः--उच्यतां तर्हि । शकारः--मालेहि वसन्तशेणिअं । ( मारय वसन्तसेनाम् । ) विटः-- ( कर्णौ पिधाय )
बालां स्त्रियञ्च नगरस्य विभूषणञ्च वेश्यामवेश-सदृश-प्रणयोपचाराम् । एनामनागसमहं यदि मारयामि केन डुपेन परलोकनदीं तरिष्ये ॥ २३ ॥
**अर्थ--विट--**तो क्या करना होगा ? **शकार--**मेरा प्रिय करो । **विट--**हाँ करूँगा, लेकिन अनुचित काम को छोड़ कर । **शकार--**अनुचित कार्य की गन्ध ( लेश ) भी नहीं है, कोई राक्षसी भी नहीं है । **विट--**तब कहिये ( क्या करना है ) ? **शकार--**वसन्तसेना को मार डालो ।
**अन्वयः--**यदि, अहम्, बालाम्, स्त्रियम्, च, नगरस्य, विभूषणम्, च, अवेश्यसदृशप्रणयोपचाराम्, अनागसम्, एनाम्, वेश्याम्, घातयामि, ( तर्हि ) केन, उडुपेन, परलोकनदीम्, तरिष्ये ॥ २३ ॥
शब्दार्थ —यदि = अगर, अहम् = विट, बालाम् = युवावस्था को प्राप्त करने वाली, च = और, स्त्रियम् = स्त्री, च = और, नगरस्य = उज्जैन नगर की, विभूषणम् = आभूषणस्वरूप, अवेशसदृशप्रणयोपचाराम् = वेश्याओं के अयोग्य प्रेम करने वाली अर्थात् वास्तविक सच्चा प्रेम करने वाली, अनागसम् = निरपराध, एनाम् = इस, वेश्याम् = वेश्या वसन्तसेना को, हन्मि = मार डालता हूँ, ( तर्हि = तो ) केन = किस, उडुपेन = नौका से, परलोकनदीम् = दूसरे लोक की नदी ( वैतरणी नदी ) को, तरिष्ये = पार कर सकूँगा ॥ २३ ॥
अर्थ--विट-- ( कानों को बन्द करके ) यदि मैं, बाला ( अल्प अवस्था वाली ) स्त्री और इस नगर की आभूषण, वेश्याओं के अयोग्य प्रेम अर्थात् वास्तविक प्रेम करने वाली निरपराध इस वेश्या ( वसन्तसेना ) को मार डालता हूँ तो किस नौका से परलोक नदी ( वैतरणी ) को पार कर सकूँगा ॥ २३ ॥