भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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४६२मृच्छकटिकम्

शकारः--तेण हि पडन्तोवालिदं कडुअ मालेहि। (तेन हि पटान्तापवारितां कृत्वा मारय।)
विटः--मूर्ख ! अपध्वस्तोऽसि।


शब्दार्थ--सुकृतदुष्कृतसाक्षिभूताः=पुण्य और पाप के साक्षी (गवाह), दश=दश, दिशः=दिशायें, च=और, वनदेवताः=वन के देवता, च=और चन्द्रः=चन्द्रमा, दीप्तकिरणः=प्रखर किरण वाला, अयम्=यह, दिवाकरः=सूर्य, च=और धर्मानिलौ=धर्म और वायु, च=और, गगनम्=आकाश, च=और, तथा=तथा, अन्तरात्मा, तथा=और, भूमिः=पृथ्वी, माम्=मुझ=पापकर्ता विट को, पश्यन्ति=देखते ।। २४ ।।

अर्थ - विट--
पुण्य और पाप की साक्षी दश दिशायें, वन के देवता, चन्द्रमा, प्रखर किरणों वाला यह सूर्य, धर्म और वायु, आकाश और अन्तरात्मा तथा पृथ्वी मुझे [पापकर्ता विट को] देखते हैं ।। २४ ।।

टीका--विविक्ते कस्तवां प्रेक्षिष्यते इति शकारवचनस्योत्तरदानायाह विटः-पश्यन्तीति। सुकृतस्य=पुण्यस्य, दुष्कृतस्य=पापस्य च साक्षिभूताः=साक्षाद्द्रष्टारः, दश=दशसंख्याकाः दिशः=आशाः, वनदेवताः=अरण्याधिदेवताः, च=तथा, चन्द्रः=शशी, च=तथा, दीप्तकिरणः=प्रखरकिरणः, अयम्=पुरो दृश्यमानः, दिवाकरः=दिनकरः, धर्मः=सुकृतम्, अनिलः=पवनः, गगनः=आकाशः, तथा, अन्तरात्मा=जीवात्मा, तथा, भूमिः=पृथ्वी, माम्=पापकारिणं विटम्, पश्यन्ति=अवलोकयन्ति। एवञ्चैतेषां साक्षित्वे पापं कतुं न प्रभवामीति विटस्याभिप्रायः। तुल्ययोगितालंकारः वसन्ततिलकं वृत्तम् ।। २४ ।।

विमर्श—इस श्लोक में समुच्चयार्थ अनेक 'च' और 'तथा' शब्द प्रयुक्त हैं। यहाँ अप्रस्तुत दिशा आदि का 'पश्यन्ति' इस एक क्रिया के साथ सम्बन्ध होने से तुल्ययोगिता अलंकार है। 'साक्षिभूताः' यह पुलिङ्ग बहुवचन है। इसमें आवश्यकतानुसार लिङ्ग और वचन का परिवर्तन कर लेना चाहिये ।। २४ ।।

शब्दार्थ--पटान्तापवारिताम्=कपड़े से छिपी हुई, अपध्वस्त=अधमाधम, वृद्धकोलः=बूढ़ा शूकर, अनुनयामि=मनाता हूँ, परिधास्यामि=पहनूंगा, पीठकम्=चौकी, तख्त, महत्तरक=मेण्ठ, मुखिया, अकार्यम्=अनुचित कार्य, प्रवहणपरिवर्तनेन=गाड़ी बदल जाने से, प्रभवामि=प्रभाव कर पा रहा हूँ, परपिण्डभक्षकः=दूसरे का अन्न खाने वाला।

अर्थशकार—तब तो कपड़े से छिपाकर मारो।
विट--मूर्ख ! तुम बहुत नीच हो।