भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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४६४ मृच्छकटिकम्

शकारः—एणं वशन्तशेणिअं मालेहि । ( एनां वसन्तसेनां मारय । )
चेटः—पशीददु भट्टके ! इमं मए अणज्जेण अज्जा पवहणपलिवत्तणेण आणीदा । ( प्रसीदतु भट्टकः इयं मया अनार्येण आर्या प्रवहणपरिवर्त्तनेनानीता । )
शकारः—अले चेडा ! तवावि ण पहवामि ? ( अरे चेट ! तवापि न प्रभवामि ? )
चेटः—पहवदि भट्टके शलीलाह, ण चालित्ताह । ता पशीददु पशीददु भट्टके । भाआमि क्खु अहं ( प्रभवति भट्टकः शरीरस्य, न चारित्रस्य । तत् प्रसीदतु भट्टकः, बिभेमि खलु अहम् । )
शकारः—तुमं मम चेड़े भविअ कश्श भाआशि ? ( त्वं मम चेटो भूत्वा कस्मात् बिभेषि ? )
चेटः—भट्टके ! पललोअश्श । ( भट्टक ! परलोकात् । )
शकारः—के शे पललोए ? ( कः सः परलोकः ? )
चेटः—भट्टके ! शुकिद-दुक्किदश्श पलिणामे । ( भट्टक ! सुकृतदुष्कृतस्य परिणामः । )
शकारः—केलीशे शुकिदस्य पालिणामे ? ( कीदृशः सुकृतस्य परिणामः ? )
चेटः—जादिशे भट्टके बहु-शोवण्ण-मण्डिदे । ( यादृशो भट्टकः बहुसुवर्णमण्डितः । )
शकारः—दुक्किदश्श केलीशे ? ( दुष्कृतस्य कीदृशः ? )


शकार—इस वसन्तसेना को मार डालो ।
चेट—स्वामी खुश रहें, ( नाराज न हों ) मैं नीच गाड़ी बदल जाने के कारण पूज्य वसन्तसेना को लाया हूँ ।
शकार—अरे चेट ! तुम पर भी मेरा प्रभाव नहीं है ।
चेट—स्वामी शरीर पर प्रभाव है, न कि चरित्र पर । इस लिये स्वामी नाराज न हों, मैं डर रहा हूँ ।
शकार—तुम मेरे नौकर होकर किससे डर रहे हो ?
चेट—स्वामी ! परलोक से ।
शकार—वह परलोक कौन है ?
चेट—स्वामी ! पुण्य और पाप का परिणाम ।
शकार—पुण्य का कैसा फल ?
चेट—जैसे स्वामी आप बहुत सोने से अलंकृत हैं ।
शकार—पाप का कैसा ?

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