भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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अष्टमोऽङ्कः ४७६

अथवा एदे वि दे ण लक्खन्ति । ( अथवा एतेऽपि त्वां न रक्षन्ति । )

चाणक्केण जधा शीदा मालिदा भालदे जुए ।
एव्वं दे मोडइश्शामि जडाऊ विअ दोव्वदिं ॥ ३५ ॥
( चाणक्येन यथा सीता मारिता भारते युगे ।
एवं त्वां मोटयिष्यामि जटायुरिव द्रौपदीम् ॥ ३५ ॥ )

( इति ताडयितुमुद्यतः । )

वसन्तसेना—हा अत्ते ! कहिं सि ? हा अज्जचारुदत्त ! एसो जणो असम्पुण्ण-मणोरधो ज्जेव विवज्जदि । ता उद्धं अक्कन्दइस्सं अथवा वसन्तसेना उद्धे अक्कन्ददि त्ति लज्जणीअं क्खु एदं । णमो अज्जचारुदत्तस्स ।


बालिपुत्रः शक्रः, रम्भापुत्रः महेन्द्रः आदि । इनमें से कोई भी चारुदत्त नहीं है—अतः वह तुम्हारी रक्षा नहीं कर सकता, यह भाव है ॥ ३४ ॥

अन्वयः—यथा, भारते, युगे, चाणक्येन, सीता, मारिता, जटायुः, द्रौपदीम्, इव, एवम्, त्वाम्, मोटयिष्यामि ॥ ३५ ॥

शब्दार्थ—यथा=जिस प्रकार, भारते=महाभारत, युगे=युग में, चाणक्येन=चाणक्य द्वारा, सीता=जनकपुत्री, मारिता=मारी गयी थी, जटायुः=जटायु ने, द्रौपदीम्=द्रुपद की पुत्री, इव=के समान, एवम्=इसी प्रकार, त्वाम्=तुम्हें वसन्तसेना को, मोटयिष्यामि=मार डालूँगा ॥ ३५ ॥

अर्थ—अथवा ये ( पूर्वोक्त ) भी तुम्हारी रक्षा नहीं कर सकते—

महाभारत युग में चाणक्य ने जैसे सीता को मार डाला था, जटायु ने द्रौपदी को, ( मार डाला था ) उसी प्रकार मैं तुम्हें मार डालूँगा । [ मसल डालूँगा ] ॥ ३५ ॥

टीका—वसन्तसेनाया वधप्रकारं वर्णयति शकारः—चाणक्येनेति । यथा=येन प्रकारेण, भारते युगे=महाभारत-काले, चाणक्येन=एतन्नामकेन नीतिविशारदेन, सीता=रामपत्नी, मारिता=हता, जटायुः = गरुड़पुत्रः पक्षिविशेषः, द्रौपदीम्=पाण्डवपत्नीम्, इव=यथा, एवम्=अनेनैव प्रकारेण, अहं शकारः, त्वाम्=वसन्तसेनाम्, मोटयिष्यामि=हनिष्यामि । अत्र ऐतिह्यविरोधोऽपि शकारवचनत्वादुपेक्ष्यः । शक्वरी-विशेषः वृत्तम् ॥ ३५ ॥

विमर्श—चाणक्य द्वारा सीता का वध और जटायु द्वारा द्रौपदी का वध कहना इतिहास-विरुद्ध है। किन्तु शकार की प्रकृति असंगत बोलने की है। अतः इसे दोष न मान कर गुण मानना चाहिये ।

मोटयिष्यामि—इसका अर्थ 'मसल दूँगा' या 'गला मरोड़ कर मार डालूँगा' ॥ ३५ ॥