भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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४८४ मृच्छकटिकम्

शकारः—भावे ! शाअदं दे । पुत्तका ! थावलका ! चेडा ! तवावि शाअदं ? ( भाव ! स्वागतं ते । पुत्रक, स्थावरक ! चेट ! तवापि स्वागतम् । )
चेटः—अध इं ? ( अथ किम् ? )
विटः—मदीयं न्यासमुपनय ।
शकारः—कीदिशे णाशे ? ( कीदृशः न्यासः ? )
विटः—वसन्तसेना ।
शकारः—गदा । ( गता । )
विटः—क्व ?
शकारः— भावश्श ज्जेव पिट्टदो । ( भावस्यैव पृष्ठतः । )
विटः—( सवितर्कम् ) न गता खलु सा तया दिशा ।
शकारः—तुमं कदमाए दिशाए गड़े ? ( त्वं कतमया दिशा गतः ? )
विटः—पूर्वया दिशा ।
शकारः—शा वि दक्खिणाए गडा । ( सापि दक्षिणया गता । )
विटः—अहं दक्षिणया ।
शकारः—शा वि उत्तळाए । ( सापि उत्तरया । )


शकार—भाव ! तुम्हारा स्वागत है । पुत्रक, स्थावरक, चेट ! तुम्हारा भी स्वागत है ।
चेट—बहुत अच्छा । ( धन्यवाद )
विट—मेरी धरोहर वापस करो ।
शकार—कैसी ?
विट—वसन्तसेना ( धरोहर ) ।
शकार—चली गई ।
विट—कहाँ ?
शकार—भाव के ही पीछे ।
विट—( विचारपूर्वक ) उस तरफ़ से तो नहीं गयी ।
शकार—तुम किस ओर से गये थे ?
विट—पूर्वं दिशा में ।
शकार—वह दाहिनी ओर गयी ?
विट—मैं दाहिनी ओर गया था ।
शकार—वह भी उत्तर की ओर ।