मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअष्टमोऽङ्कः ४८५
विटः -अत्याकुलं कथयसि। न शुध्यति मे अन्तरात्मा। तत् कथय सत्यम्।
शकारः--शवामि भावश्श शीशं अत्तगकेलकेहिं पादेहिं, ता शण्डावेहि हिअअं, एशा मए मालिदा। ( शपे भावस्य शीर्षमात्मीयाभ्यां पादाभ्याम्, तत् संस्थापय हृदयम्, एषा मया मारिता । )
विटः--( सविषादम् ) सत्यं त्वया व्यापादिता ?
शकारः--जइ मम वअणे ण पत्तिआअसि, ता पेक्ख पढमं लट्ठित्रशालसण्ठाणाह शूलत्तणं। ( यदि मम वचने न प्रत्ययसे, तत् प्रेक्षस्व प्रथमं राष्ट्रिय-श्याल-संस्थानस्य शूरत्वम् । ) ( इति दर्शयति । )
विटः--हा ! हतोऽस्मि मन्दभाग्यः ! ( इति मूर्च्छितः पतति । )
शकारः--ही ही उवलदे भावे । ( ही ही ! उपरतो भावः । )
चेटः--शमश्शशदु शमश्शशदु भावे। अविचालिअं पवहणं आणन्तेण ज्जेव मए पढमं मालिदा ( समाश्वसितु समाश्वसितु भावः। अविचारितं प्रवहणमानयतैव मया प्रथमं मारिता । )
विट--बहुत बबड़ा कर कह रहे हो। मेरा मन शुद्ध नहीं हो रहा है, सन्देह कर रहा है। इसलिये सच-सच बताओ।
शकार--भाव ! आपके शिर की अपने पैरों से शपथ लेता हूँ। अतः अपने हृदय को कड़ा करो ( धीरज रखो )। उसे मैंने मार डाला।
विट--( दुःख के साथ ) सचमुच तुमने मार डाली ?
शकार--यदि मेरी बात पर विश्वास नहीं है तो राजा के साले संस्थान की पहली बहादुरी देख लो। ( यह कह कर दिखाता है। )
विट--हाथ, अभागा मैं मारा गया। ( मूर्च्छित होकर गिर जाता है। )
शकार--हा, हा, भाव मर गया।
चेट--भाव ! आप धीरज रखें, धीरज रखें, बिना सोचे समझे गाड़ी लाते हुये मैंने पहले ही मार डाली थी।
टीका--अपसृत्य = तत्स्थानं परित्यज्य, अनुनीतः = आनुकूल्यतां प्रापितः, व्यापादिता=मारिता, अकार्यम्=कुकृत्यम्, पातिताः=पापे निपातिताः, अनिमित्तम्=अपशकुनम्, स्वस्ति=कल्याणम्, न्यासम् = वसन्तसेनारूपमित्यर्थः, शुध्यति=निर्दोषतां याति, शङ्कारहितं भवतीति भावः, संस्थापय = दृढं कुरु, धैर्यं धारयेति भावः, व्यापादिता = मारिता, उपरत: = मर गया, अविचारितम् = सम्यग् रूपेणानवलोकितमित्यर्थः ।