मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४८६ मृच्छकटिकम्
विटः – (समाश्वस्य सकरुणम्) हा वसन्तसेने !
दाक्षिण्योदकवाहिनी विगलिता याता स्वदेशं रतिः हा हालङ्कृतभूषणे ! सुवदने ! क्रीडारसोद्भासिनि ! । हा सौजन्यनदि ! प्रहासपुलिने ! हा मादृशामाश्रये ! हा हा नश्यति मन्मथस्य विपणिः सौभाग्यपण्याकरः ॥ ३८ ॥
**विमर्श—**विट को रास्ता में एक पेड़ का गिरा होना और उससे किसी स्त्री की हत्या होना दिखाई देता है । यह आगे के कथानक में सहायक है । शकार वसन्तसेना की हत्या करके यह अपराध निर्दोष चारुदत्त के सिर पर डाल देता है । न्यायालय के निर्देश से जब उद्यान देखा जाता है तब इसी मरी हुई स्त्री को वसन्त-सेना मान लिया जाता है । फलस्वरूप चारुदत्त पर वसन्तसेना की हत्या का अपराध सिद्ध हो जाता है और मृत्युदण्ड दे दिया जाता है ।
**अन्वयः—**दाक्षिण्योदकवाहिनी, विगलिता; रातेः, स्वदेशम्, याता, हा, हा, अलङ्कृतभूषणे ! सुवदने ! क्रीडारसोद्भासिनि !, हा प्रहासपुलिने ! सौजन्यनदि ! हा ! मादृशाम् आश्रये !, हा, हा, मन्मथस्य, विपणिः, सौभाग्यपण्याकरः, नश्यति ॥ ३८ ॥
**शब्दार्थ—**दाक्षिण्योदकवाहिनी = उदारतारूपी जल की नदी, विगलिता= समाप्त हो गयी, रतिः = कामदेव की प्रिया, स्वदेशम् = अपने देश (स्वर्ग), यांता=चली गयी, हा, हा, अलङकृतभूषणे=हाय, हाय ! अलंकारों को भी सजाने-वाली !, सुवदने = सुन्दर शरीर वाली ! या सुमुखी, क्रीडारसोद्भासिनि=काम-क्रीडा रस को शोभित करने वाली ! हा प्रहासपुलिने = हाय हाय हंसी रूपी बालू के तटों वाली !, सौजन्यनदि=सुजनता रूपी नदी !, हा, हा मादृशाम् आश्रये=हाय हाय, हम जैसे लोगों की सहारा !, हा-हा मन्मथस्य = हाय हाय कामदेव की, विपणिः = बाजार, सौभाग्यपण्याकरः = सौन्दर्यरूपी विक्रेय पदार्थों की खान, नश्यति=नष्ट हो गयी ॥ ३८ ॥
अर्थ—विट— (धैर्य धारण करके, करुणापूर्वक) हा वसन्तसेने !
उदारतारूपी जल की नदी समाप्त हो गयी । कामदेव की पत्नी रति अपने लोक (स्वर्ग) चली गयी । हाय, हाय ! आभूषणों को भी सुशोभित करने वाली ! सुन्दर मुख (=शरीर) वाली ! हाय ! कामक्रीडा के रस को सुशोभित करने वाली ! हाय सुजनतारूपी नदी ! हाय परिहास का बालुकामय किनारा ! हाय-हाय हमारे जैसे लोगों की सहारा ! हाय हाय ! कामदेव की बाजार, सुन्दरतारूपी विक्रेय पदार्थों की खान नष्ट हो गयी ॥ ३८ ॥