मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअष्टमोऽङ्कः ४८३
भोदु, सम्पढं बुद्धख्लोड़े आगमिश्रदित्ति ता ओशलिअ चिट्ठामि । ( भवतु, साम्प्रतं वृद्धशृगाल आगमिष्यतीति तदपसृत्य तिष्ठामि । ) ( तथा करोति । ) ( प्रविश्य चेटेन सह । ) विटः—अनुनीतो मया स्थावरकश्चेटः । तद् यावत् काणेलीमातरं पश्यामि । ( परिक्रम्यावलोक्य च ) अये ! मार्ग एव पादपो निपतितः । अनेन च पतता स्त्री व्यापादिता । भोः पाप ! किमिदमकार्यमनुष्ठितं त्वया ? तवापि पापिनः पतनात् स्त्रीवधदर्शनेनातीव पतिताः वयम् । अनिमित्तमेतद् यत्सत्यं वसन्तसेनां प्रति शङ्कितं मे मनः, सर्वथा देवताः स्वस्ति करिष्यन्ति । ( शकारमुपसृत्य ) काणेलीमातः ! एवं मया अनुनीतः स्थावरकश्चेटः ।
जनकः, वञ्चितः=प्रतारितः, दर्शनसुखं न प्राप्तवानिति भावः । द्रौपदी=पाण्डवपत्नी, इव=यथा, सा=प्रसिद्धा, माता=जननी, च, वञ्चितेति । लिङ्गव्यत्ययेन सम्बन्धः करणीयः, यः असौ=पूर्वोक्तः भ्राता, पिता, जननी च, पुत्रस्य=सुतस्य, शकारस्य, ईदृशम्=पूर्वोक्तम्, व्यवसितम्=अनुष्ठितम्, शूरत्वम्=पराक्रमम्, न=नैव, पश्यति=अवलोकयति । अतस्तेषां चक्षुषोः वैफल्यमिति तद्भावः । शार्दूलविक्रीडितं वृत्तम् ॥ ३७ ॥
शब्दार्थ—वृद्धशृगालः=बूढ़ा सियार विट, पादपः=पेड़, व्यापादिता=मार डाली, पाप=पापी, पतिताः=पतित बना दिये गये, स्वस्ति=कल्याण, अनुनीतः=मना लाया, न्यासम्=धरोहर अर्थात् वसन्तसेना, अत्याकुलम्=बहुत घबड़ाकर, शपे=शपथ लेता हूँ, संस्थापय=कडा करो, धैर्य रखो, अविचारितम्=बिना सोंच विचार के ।
अर्थ—अच्छा, अब बूढ़ा सियार आता होगा अतः अब अलग हटकर बैठता हूँ। ( अलग हट कर बैठ जाता है । )
( चेट के साथ प्रवेश करके )
विट—मैंने स्थावरक चेट को मना लिया ( प्रसन्न कर लिया ) है । अतः काणेली के बच्चे ( शकार ) को देखता हूँ । ( घूमकर और देखकर ) अरे ! रास्ता में ही पेड़ गिर पड़ा है । और गिरते हुए इसने स्त्री को मार डाला है । अरे पापी ! तूने यह क्या अनुचित काम कर डाला ? तुझ पापी के गिरने से हुये स्त्री-वध को देखने से हम लोग बहुत अधिक पतित बना दिये गये । यह अपशकुन है, सचमुच वसन्तसेना के विषय में मेरा मन शंका से भर गया । देवता लोग हर स्थिति में कल्याण करेंगे । ( शकार के पास जाकर ) काणेली के पुत्र ! मैं इस प्रकार से चेट को मना कर ( प्रसन्न कर ) ले आया हूँ ।