भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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अष्टमोऽङ्कः ४९३

शकारः--मम केलके पुप्फकलण्डकजिण्णुज्जाणे वशन्तशेणिअं मालिअ कहिं पलाअसि ? एहि, मम आवुत्तशश अग्गदो ववहालं देहि । ( मदीये पुष्पकरण्डक-जीर्णोद्याने वसन्तसेनां मारयित्वा कस्मिन् पलायसे ? एहि, मम आवुत्तस्य अग्रतो व्यवहारं देहि । ) ( इति धारयति )

विटः— आः ! तिष्ठ जाल्म ! ( इति खड्गमाकर्षति ) ।

शकारः--( सभयमुपसृत्य ) किं ले ! भोदेशि ? ता गच्छ । ( किं रे ! भीतोऽसि ? तद्गच्छ । )

विटः—( स्वगतम् ) न युक्तमवस्थातुम् । भवतु, यत्र आर्यशर्विलक-चन्दनकप्रभृतयः सन्ति, तत्र गच्छामि । ( इति निष्क्रान्तः । )

शकारः--णिधणं गच्छ । अले थावलका ! पुत्तका । कीलिशे मए किदे ? ( निधनं गच्छ । अरे स्थावरक ! पुत्रक ! कीदृशं मया कृतम् ? )

चेटः- भट्ठके ! महन्ते अकज्जे किदे । ( भट्टक ! महदकार्यं कृतम् । )

शकारः--अले चेड़े ! किं भणाशि अकज्जे किडेत्ति ? भोदु, एव्वं दाव । ( नानाभरणान्यवतार्य ) गेण्ह एदं अलङ्कारअं, मए तावदिण्णे जेत्तिके वेले अलङ्कलेमि, तेत्तिकं वेलं मम अण्णं तव । ( अरे चेट ! किं भणसि अकार्यं कृतमिति ? भवतु, एवं तावत् । ) ( गृहाण इममलङ्कारं मया ताव-द्दत्तम्, यावत्यां वेलायामलङ्करोमि, तावतीं वेलां मम अन्यदा तव । )


बेड़ी पहनाकर, मन्त्रः = इत्यारूपी गुप्त योजना, सुवृत्ता = अच्छी प्रकार मर गई, प्रावारकेण = दुपट्टे से, प्रत्यभिजानाति = पहचान लेता है, वातालीपुञ्जितेन = अन्धड़ से एकत्रित किये गये, व्यवहारम् = मुकदमा, व्यापादिता = मार डाली ।

अर्थ—शकार—मेरे पुष्पकरण्डक नामक जीर्णोद्यान में वसन्तसेना को मार कर कहाँ भाग रहे हो ? चलो, मेरे बहनोई के सामने अपनी सफाई दो । ( ऐसा कह कर पकड़ लेता है ।)

विट—अरे नीच ! ठहर जा । ( यह कह कर तलवार खींच लेता है ।)

शकार--( भय के साथ हटकर ) अरे ! क्या तुम डर गये ? तो जाओ ।

विट--( अपने में ) अब ( यहाँ ) रुकना ठीक नहीं है । अच्छा, जहाँ आर्य शर्विलक चन्दनक आदि हैं, वहीं चलता हूँ । ( इस प्रकार निकल जाता है ।)

शकार—मर जाओ । अरे स्थावरक बेटा ! मैंने कैसा किया ?

चेट—स्वामिन् ! बहुत अनुचित किया ।

शकार—अरे चेट ! क्या कह रहे हो—अकार्य = अनुचित कार्य किया है ? अच्छा ऐसा करूँ ( अनेक गहने उतार कर ) इन गहनों को ले लो । मैंने दे दिये हैं, जब तक पहनता हूँ तब तक मेरे हैं और दूसरे समय में तुम्हारे ।