भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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४६४ मृच्छकटिकम्

**चेटः--**भट्टके ज्जेव एदे शोहन्ति, किं मम एदेर्हि ? ( भट्टके एव एते शोभन्ते, किं मम एतैः ? )

**शकारः--**ता गच्छ, एदाईं गोणाईं गेण्हिअ मम केलिकाए पाशाद-वालग्गपादोलिआए चिट्ठ, जाव हग्गे आगच्छामि । ( तद् गच्छ, एतौ गावो गृहीत्वा मदीयायां प्रासाद-बालाग्रप्रतोलिकायां तिष्ठ, यावदहमागच्छामि । )

**चेटः--**जं भट्ठके आणवेदि । ( यद्भट्टक आज्ञापयति । ) ( इति निष्क्रान्तः । )

**शकारः--**अत्तपलित्ताणे भावे गदे अदशणं, चेडं वि पाशाद-बालग्ग-पदोलिआए णिगलपूलिदं कदुअ थावइश्शं । एव्वं मन्ते रक्खिदे भोदि । ता गच्छामि । अथवा, पेक्खामि दाव एदं, किं एशा मिदा अथवा पुणो वि मारइश्शं । ( अवलोक्य ) कथं शुमिदा । भोदु, एदिणा पावालएण पच्छादेमि णं । अथवा णामङ्किदे एशे, ता के वि अज्जपुलिशो पच्छहिजा-णेदि । भोदु, एदिणा वादालीपुञ्जिदंण शुक्ख-पण्ण-पुडेण पच्छादेमि । ( तथा कृत्वा विचिन्त्य ) भोदु, एव्वं दाव, सम्पदं अधिअलणं गच्छिअ वंवहालं लिहावेमि । जहा अत्थश्श कालणादो शत्थवाह-चालुदत्ताकेण मम केलकं पुप्फकलण्डकं जिण्णुज्जाणं पवेशिअ वशन्तशेणिआ वावादिदे-त्ति । ( आत्मपरित्राणे भावो गतः अदर्शनम् । चेटमपि प्रासादबालाग्रप्रतोलिकायां निगडपूरितं कृत्वा स्थापयिष्यामि । एवं मन्त्रो रक्षितो भवति । तद्गच्छामि । अथवा, पश्यामि तावदेनाम्, किमेषा मृता । अथवा पुनरपि मारयिष्यामि । कथं सुमृता । भवतु, एतेन प्रावारकेण प्रच्छादयामि एनाम् । अथवा नामाङ्कित एषः, तत् कोऽपि आर्यपुरुषः प्रत्यभिजानाति । भवतु, एतेन वातालीपुञ्जितेन शुष्कपर्णपुटेन प्रच्छादयामि । भवतु, एवं तावत् साम्प्रतमधिकरणं गत्वा व्यव-


**चेट--**ये ( गहने ) स्वामी पर ही अच्छे लगते हैं, मुझसे इनसे क्या ?

**शकार--**तो जाओ, इन दोनों बैलों को लेकर मेरी क्रीडा के लिये बने महल की अटारीवाली गली में ठहरो, तब तक मैं आता हूँ ।

**चेट--**स्वामी की जैसी आज्ञा ।

**शकार--**भाव अपनी रक्षा के लिये चला गया । चेट को भी महल की नवनिर्मित अटारी वाले कमरे में बेड़ियों से जकड़ कर रखूँगा, इस प्रकार से यह गुप्त कार्य सुरक्षित रहेगा । तो चलता हूँ । अथवा, इसको देखूँ कि यह मरी ? अथवा फिर मार डालूँगा । ( देखकर ) क्या, अच्छी तरह मर गई । अच्छा, इस दुपट्टे से इसे ढक दूँ । अथवा, इसमें नाम लिखा हुआ है, इसलिये कोई भी शिक्षित व्यक्ति पहचान लेगा । अच्छा, अन्धड़ से एकत्रित इन पत्तों के समूह से ढक देता हूँ । ( ढक कर और सोंचकर ) अब कचहरी में जाकर मुक़दमा लिखवा