भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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पृष्ठ 585

अष्टमोऽङ्कः ४६७

( प्रविश्य अपटीक्षेपेण )

संवाहको भिक्षुः—पक्खालिदे एश मए चीवलखण्डे, किं णु क्खु शाखाए शुक्खावइश्शं ? इध वाणला विलुप्पान्त । किं णु क्खु भूमीए ? धूलोदोशे होदि । ता कहिं पशालिअ शुक्खावइश्शं । ( दृष्ट्वा ) भोदु, इष वादाली-पुञ्जिदे शुक्ख-वत्त-शञ्चए पशालइश्शं । ( तथा कृत्वा ) णमो बुद्धश्श । (इत्युपविशति ।) भोदु, धम्मक्खलाइ उदाहलामि । ( 'पञ्च जण जेण मालिदा' इत्यादि पूर्वोक्तं पठति । ) अथवा, अलं मम एदेण शग्गेण । जाव ताए वसन्त-शेणिआए बुद्धोवाशिआए पच्चुवकालं ण कलेमि, जाए दशाणं शुवण्णकाणं किदे जूदिकलेहिं णिक्कीदे, तदो पहुदि ताए किदं विअ अत्ताणं अवगच्छामि । ( दृष्ट्वा ) किं णु क्खु पण्णोदले शमुश्शशदि ? अथवा—

( प्रक्षालितमेतन्मया चीवरखण्डन् । किं नु खलु शाखायां शोषयिष्यामि ? इह वानरा विलुम्पन्ति । किं नु खलु भूम्याम् ? धूलिदोषो भवति । तत् कुत्र प्रसार्य शोषयिष्यामि ? भवतु, इह वातालीपुञ्जिते शुष्क-पत्रसञ्चये प्रसारयिष्यामि । नमो बुद्धाय । भवतु, धर्माक्षराणि उदाहरामि । अथवा अलं ममैतेन स्वर्गेण । यावत्तस्या वसन्तसेनायाः बुद्धोपासिकायाः प्रत्युपकारं न करोमि, यया दशानां सुवर्णकानां कृते द्यूतकाराभ्यां निष्क्रीतः, ततः प्रभृति तया क्रीतमिवात्मानमवगच्छामि । किं नु

शब्दार्थ—अपटीक्षेपेण=बिना पर्दा हटाये, चीवरखण्डम्=वस्त्रविशेष का टुकड़ा, धर्माक्षराणि=धर्म के अक्षरों को, तस्याः=उस वसन्तसेनाका, निष्क्रीतः=मुक्त कराया गया, खरीदा हुआ, पर्णोदरे=पत्तों के बीच में ।

( बिना पर्दा हटाये प्रवेश करके )

**अर्थ—संवाहक भिक्षु—**मैंने यह चीवर (वस्त्र) का टुकड़ा धो लिया है । तो क्या पेड़ की शाखा पर सुखा लूँ ? यहाँ बन्दर लेकर भाग जायेंगे । तो क्या जमीन पर सुखाऊँ ? इससे धूल लग जायगी । तब फिर कहाँ फैलाकर सुखाऊँ ? ( देख कर ) अच्छा, यहाँ बवण्डर से एकत्रित सूखे पत्तों के ढेर पर सुखाऊँगा । ( उसी प्रकार फैलाकर ) बुद्ध भगवान् को प्रणाम । (ऐसा कह कर बैठ जाता है ।) अथवा धार्मिक अक्षरों का उच्चारण करता हूँ । ( 'जिसने पाँच लोगों=इन्द्रियों को मार डाला'—इत्यादि पूर्वोक्त इसी अंक का दूसरा श्लोक पढ़ता है ।) अथवा, मुझे इस स्वर्ग से क्या लेना देना । जब तक उस बुद्धोपासिका ( वसन्तसेना ) का बदला नहीं चुका लेता हूँ, जिसने दश सोने के सिक्कों के लिये मुझे दोनों जुआरियों से मुक्त कराया था, उस समय से लेकर अपने को उसके द्वारा खरीदा हुआ सा समझ रहा हूँ । ( देखकर ) अरे पत्तों के बीच में यह कौन सांस ले रहा है ? अथवा—

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