मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअष्टमोऽङ्कः ४६१
( वसन्तसेना संज्ञां लब्ध्वा हस्तं दर्शयति ।)
भिक्षुः—हा हा ! शुद्धालङ्कालभूशिदे इत्थियाहत्थे णिक्कमदि । कधं दुदिए वि हत्थे ? ( बहुविधं निर्वर्ण्य ) पञ्चभिआणामि विअ एदं हत्थं । अथवा, किं विचारेण ? शच्चं शे ज्जेव हत्थे, जेणा मे अभअं दिष्णं । भोदु, पेक्खिश्शं । (नाट्येनोद्घाट्य दृष्ट्वा प्रत्यभिज्ञाय च ) शा ज्जेव बुद्धोवाशिआ । ( हा हा ! शुद्धालङ्कारभूषितः स्त्रीहस्तो निष्क्रामति ।) ( कथं द्वितीयोऽपि हस्तः ? प्रत्यभिजानामीव एतं हस्तम् । अथवा, किं विचारेण, सत्यं स एव हस्तः, येन मे अभयं दत्तम् । भवतु, प्रेक्षिष्ये । ) ( सैव बुद्धोपासिका । )
( वसन्तसेना पानीयमाकाङ्क्षति ।)
भिक्षुः—कधं उदअं मग्गेदि, दूरे च दिग्घिआ । किं दाणि एत्थ कलाईश्शं ? भोदु, एदं चीवलं शे उवरि गालइश्शं । (कथमुदकं याचते दूरे च दीर्घिका । किमिदानीमत्र करिष्यामि ? भवतु, एतच्चीवरमस्या उपरि गालयिष्यामि । ) ( तथा करोति । )
( वसन्तसेना संज्ञां लब्ध्वा उत्तिष्ठति । भिक्षुः पटान्तेन वीजयति ।)
वसन्तसेना—अज्ज ! को तुमं ? ( आर्य ! कस्त्वम् ? )
भिक्षुः—किं मं ण सुमरेदि बुद्धोवाशिआ दश-शुवण्णणिक्कोदं ? (किं मां न स्मरति बुद्धोपासिका दश-सुवर्ण-निष्कीतम् ? )
अर्थ—( वसन्तसेना होश में आकर हाथ दिखाती है ।)
भिक्षु—हाय, हाय, शुद्ध गहनों से सजा हुआ स्त्री का हाथ बाहर निकल रहा है। क्या, दूसरा भी हाथ (निकल रहा है) ? (अनेक प्रकार से देख कर) इस हाथ को पहचानता सा हूँ। अथवा, सोचना क्या, सचमुच वही हाथ है जिसने मुझे अभयदान दिया था। अच्छा, देखता हूँ । (अभिनय के साथ पत्तों को हटा कर देख कर और पहचान कर ) वही बुद्धोपासिका (वसन्तसेना) है।
(वसन्तसेना पानी मांगती है।)
भिक्षु—क्या, पानी मांग रही है ? और बावड़ी दूर है। अब यहाँ क्या करूँ ? अच्छा, यह चीवर इसके ऊपर निचोड़ता हूँ। (चीवर निचोड़ने लगता है।)
(वसन्तसेना होश में आकर उठ बैठती है। भिक्षु कपड़े के छोर से हवा करता है।)
वसन्तसेना—आर्य? आप कौन हैं?
भिक्षु—क्या बुद्धोपासिका आप दश सोने के सिक्कों से खरीदे हुए मुझे नहीं याद कर पा रहीं हैं?