मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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वसन्तसेना—सुमरामि ण उण जधा अज्जो भणादि। वरं अहं उवेरदा ज्जेव। (स्मरामि, न पुनर् यथा आर्यो भणति। वरमहमुपरतैव।)
भिक्षुः—बुद्धोवाशिए ! किं ण्णेद ? (बुद्धोपासिके ! किं नु इदम् ? )
वसन्तसेना—(सनिर्वेदम्) जं सरिसं वेसभावस्स। (यत् सदृशं वेश-भावस्य।)
भिक्षुः—उट्ठेदु उट्ठेदु बुद्धोवासिआ एदं पादव-समोवजादं लदं ओलम्बिअ। (उत्तिष्ठतु उत्तिष्ठतु बुद्धोपासिका एतां पादपसमीप-जातां लतामव-लम्ब्य।) (इति लतां नामयति।) (वसन्तसेना गृहीत्वा उत्तिष्ठति।)
भिक्षुः—एदश्शि विहाले मम धम्मवहिणिआ चिट्ठदि, तहिं शम-श्शशिदमणा भविअ उवाशिआ गेहं गमिश्शदि। ता शेणं शेणं गच्छदु बुद्धोवाशिआ। (इति परिक्रामति। दृष्ट्वा) ओशलध अज्जा ! ओशलध। एशा तलुणी इत्थिआ, एशो भिक्खु त्ति शुद्धे मम एशे धम्मे। (एतस्मिन् विहारे मम धर्मभगिनी तिष्ठति, तस्मिन् समाश्वस्तमना भूत्वा उपासिका गेहं गमिष्यति। तत् शनैः शनैः गच्छतु बुद्धोपासिका।) (अपसरत आर्याः ! अपसरत। एषा तरुणी स्त्री, एष भिक्षुरिति शुद्धो मम एष धर्मः।)
वसन्तसेना—याद कर रही हूँ, किन्तु जैसा आप कह रहे हैं वैसा नहीं। इससे तो मैं मरी हुई ही ठीक थी।
भिक्षु—बुद्धोपासिके ! यह क्या है ?
वसन्तसेना—(दुख के साथ) जो वेश्यापन के लायक है।
भिक्षु—इस पेड़ के पास निकली हुई लता को पकड़ कर बुद्धोपासिका आप उठिये, उठिये।
(लता को झुकाता है।)
(वसन्तसेना लता को पकड़ कर उठती है।)
भिक्षु—इस बौद्धविहार में मेरी धर्म की बहिन रहती है, वहाँ आप धैर्य धारण कर (निश्चिन्त होकर) घर चली जाना। अतः बुद्धोपासिका आप धीरे-धीरे चलें। (ऐसा कहकर घूमता है और देखकर) सज्जनों ! हटिये, हटिये। यह जवान औरत है। और यह मैं भिक्षु हूँ, इस कारण मेरा धर्म पवित्र=निर्दोष है।
टीका—संज्ञाम्=चेतनाम्, शुद्धैः = निष्कलङ्कः यद्वा अमिश्रितधातुनिष्पन्नः, अलङ्कारैः=आभूषणैः, भूषितः=सज्जितः, निष्क्रामति=वातालीपुञ्जात् बहिरागच्छति, प्रत्यभिजानामि=परिचिनोमि, दीर्घिका=वापी, गालयिष्यामि=निष्पीडयिष्यामि, वर्तमानसामीप्ये लट्, पटान्तेन = वस्त्रान्तभागेन, वीजयति = पवनं करोति,