मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनवमोऽङ्कः
( ततः प्रविशति शोधनकः । )
शोधनकः—–आणत्तम्हि अधिअरणभोइएहिं-‘अरे सोहणआ ! ववहार-मण्डवं गदुअ आसणाईं सज्जीकरेहि’ त्ति । ता जाव अधिअरणमण्डवं सज्जिदुं गच्छामि । ( परिक्रम्यावलोक्य च ) एदं अधिअरणमण्डवं, एस पविशामि । ( प्रविश्य सम्मार्ज्य आसनमाधाय ) विवित्तं कारिदं मए अधिअरणमण्डवं, विरइदाइं मए आसणाई, ता जाव अधिअरांणिआणं उण णिवेदेमि । ( परिक्रम्यावलोक्य च ) कथं एसो रट्टिअस्सालो दुट्ठ-दुज्जण-मणुस्सो इदो एव्व आअच्छदि, ता दिट्ठिपथं परिहरिअ गमिस्सं । ( आज्ञप्तोऽस्मि अधिकरणभोजकैः—‘अरे शोधनक ! व्यवहारमण्डपं गत्वा आसनानि सज्जीकुरु’ इति । तद् यावदधिकरणमण्डपं सज्जितुं गच्छामि । एषोऽधिकरणमण्डपः, एष प्रविशामि । विविक्तः कारितः मया अधिकरणमण्डपः, विरचितानि मया आसनानि । तद् यावदधिकरणिकानां पुनः निवेदयामि । कथमेष राष्ट्रियश्यालो दुष्ट-दुर्जन-मनुष्य इत एव आगच्छति । तदा दृष्टिपथं परिहृत्य गमिष्यामि । ) ( इत्येकान्ते स्थितः । )
शब्दार्थ– शोधनकः=सफाई कर्मचारी, आज्ञाप्तः=निर्दिष्ट किया गया, अधिकरणभोजकैः=न्यायालय के अधिकारियों द्वारा, व्यवहारमण्डपम्=मुकदमों के स्थान=न्यायालय को, विविक्तः=( व्यर्थ की चीजों से ) रहित, स्वच्छ, अधिकरणिकानाम्=न्यायालय के अध्यक्षों का, दृष्टिपथम्=नजर में आना, परिहृत्य=बचांकर, उज्वलवेशधारी=चमकीले कपड़े पहने ।
( इसके बाद स्वच्छता-कर्मचारी प्रवेश करता है । )
अर्थ– शोधनक—न्यायालयके अधिकारियों ने मुझे यह आज्ञा दी है—‘अरे शोधनक ! न्यायालय में जाकर आसनों ( = कुर्सियों ) को सजा दो ।’ इस लिये न्यायालय को सजाने के लिये चलता हूँ । ( घूमकर और देखकर ) यह न्यायालय है । यह मैं इसमें प्रवेश करता हूँ। ( घुसकर, सफाई करके कुर्सियाँ लगा कर ) मैंने न्यायालय को साफ=सजा हुआ, करा दिया है । कुर्सियाँ लगवा दीं है । इस लिये अब फिर न्यायाधिकारियों से निवेदन करता हूँ । ( घूमकर और देख कर ) क्या यह राजा का शाला दुष्ट मनुष्य इधर ही आ रहा है ? तो इसकी आँख बचाकर जाऊँगा ।
( यह कह कर एकान्त=एक ओर खड़ा हो जाता है । )