भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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नवमोऽङ्कः ५०५

खणेण गण्ठी खणजूलिके मे खणेण बाला खणकुन्तले वा ।
खणेण मुक्के खण उद्धचूडे चित्ते विचित्ते हगे लाअशाले ॥ २ ॥
( क्षणेन ग्रन्थिः क्षणजूलिका मे क्षणेन बालाः क्षणकुन्तला वा ।
क्षणेन मुक्ताः क्षणमूर्ध्वचूड़ा चित्रो विचित्रोऽहं राजश्यालः ॥ २ ॥ )

आसीनः, सुविहितैः=सुविभूषितैः, अङ्गकैः=अवयवैः, गन्धर्वः=देवगायकः, इव=यथा, संवृत्तः अस्मि । शकारवचनत्वात् पुनरुक्तिर्न दोषायेति बोध्यम् । प्रहर्षिणी वृत्तम् ॥१॥

विमर्श---शकार अपनी प्रशंसा करता हुआ अपने को गन्धर्वतुल्य मानने लगता है । यहाँ 'सलिल जल पानीय' तीनों पर्याय हैं । 'उद्यान उपवन कानन' भी पर्याय हैं । 'नारी युवती' भी अंशतः पर्याय हैं । परन्तु शकार का ऐसा बोलना स्वभाव होने से दोष नहीं है । इसका पाठान्तर भी उपलब्ध होता है ॥ १ ॥

अन्वयः - मे, [केशेषु] क्षणेन, ग्रन्थिः, क्षणजूलिका, [ च, भवति ], क्षणेन, बालाः, वा, क्षणकुन्तलाः, क्षणेन, मुक्ताः, क्षणम्, ऊर्ध्वचूड़ाः, [ भवन्ति ], अहम्, चित्रः, विचित्रः, राजश्यालः [ अस्मि ] ॥ २ ॥

**शब्दार्थ-**मे=मेरे, [ केशेषु=बालों में ], क्षणेन=एक क्षण में, ग्रन्थिः=गांठ, [ बन्ध जाती है ], क्षणजूलिका=क्षण में जूड़ा [ लग जाता है ] क्षणेन=क्षण में, बालाः=सादे बाल, वा=अथवा, क्षणकुन्तलाः=एकक्षण में घुंघराले बाल, क्षणेन=क्षण में, मुक्ताः=बिखरे हुये बाल, क्षणम्=क्षण भर में, ऊर्ध्वचूड़ाः=ऊपर की ओर जूड़ा वाले [ भवन्ति=हो जाते हैं ] अहम्=मैं, चित्रः=आश्चर्यकारक, विचित्रः=अद्भुत, राजश्यालः=राजा का शाला, [ अस्मि=हूँ ] ॥ २ ॥

अर्थ--मेरे [ शिर के बालों में ] एक क्षण में गांठ [ लग जाती है । ] दूसरे क्षण में जूड़ा [ बन्ध जाता है । ] क्षण भर में सादे बाल [ बन जाते हैं । ] दूसरे क्षण में घुंघराले बाल हो जाते हैं। दूसरे ही क्षण बिखरे हुये हो जाते हैं, क्षणभर में ऊपर की ओर जूड़ा बन जाते हैं । मैं आश्चर्यकारक अद्भुत राजश्यालक हूँ ॥२॥

टोका----नानाविधकेशविन्यासात् शकारः स्वानुपमं सौन्दर्य प्रकटयति-क्षणेनेति । मे=मम, शकारस्येत्यर्थः, [ केशेषु = शिरस्थेषु केशेषु ], क्षणेन=क्षण-कालम्, ग्रन्थिः=केशबन्धः, क्षणजूलिकाः=क्षणेन जटाः, क्षणेन=क्षणकालम्, कुन्तलाः=बञ्चलाः, क्षणेन=क्षणकालम्, मुक्ताः=बन्धनशून्याः, क्षणम्, ऊर्ध्वचूड़ाः=उपरि-भागे चूडारूपतां प्राप्ताः, भवन्ति, अहम्=शकारः, चित्रः=आश्चर्यकारकः, विचित्रः=अद्भुतः, राजश्यालः=राष्ट्रियः, अस्मि । उपजातिः वृत्तम् ॥ २ ॥