मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनवमोऽङ्कः ५०७
शोधनकः---(अन्यतः परिक्रम्य पुरो दृष्ट्वा) एदे अधिअरणिआ आअच्छन्ति। ता जाव उवसप्पामि। (एते अधिकरणिका आगच्छन्ति। तद् यावदुपसर्पामि।) (इत्युपसर्पति।)
(ततः प्रविशति श्रेष्ठि-कायस्थादि-परिवृतोऽधिकरणिकः।)
अधिकरणिकः---भो भोः श्रेष्ठि-कायस्थौ ! ।
श्रेष्ठि-कायस्थौ---आणवेदु अज्जो। (आज्ञापयतु आर्यः।)
अधिकरणिकः---अहो ! व्यवहारपराधीनतया दुष्करं खलु परचित्तग्रहणमधिकरणिकैः।
दबा कर वसन्तसेना को मार डाला।" तो तब तक न्यायालय ही चलता हूँ। (घूम कर और देखकर) यह न्यायालय है। अतः इसमें प्रवेश करता हूँ। (घुस कर और देखकर) क्या आसन लगा दिये गये ? जब तक न्यायालय के अधिकारी लोग आते हैं तब तक दूब वाले चबूतरे पर बैठकर थोड़ी देर तक प्रतीक्षा कर लेता हूँ।
(उसी प्रकार बैठ जाता है।)
शोधनक--(दूसरी ओर घूम कर सामने देखकर) ये न्यायालय के अधिकारी आ रहे हैं। अतः इनके पास चलता हूँ। (यह कहकर पास चला जाता है।)
(इसके बाद सेठ और कायस्थ आदि से घिरा हुआ न्यायाधिकारी प्रवेश करता है।)
अधिकरणिक--अरे सेठ और कायस्थ !
सेठ और कायस्थ--श्रीमन् ! आदेश दीजिये।
अधिकरणिक--ओह ! मुक़दमा के पराधीन होने के कारण दूसरे के मन की बात को समझ पाना बहुत कठिन है। (दूसरों की बातें सुनकर ही निर्णय करना पड़ता है। मुक़दमेबाज बहुत कम सच बोलते हैं। अतः सही निर्णय कर पाना अति कठिन होता है।)
टीका--विषस्य = विषवृक्षस्य, ग्रन्थेः = पर्वणः, गर्भे = अभ्यन्तरे, प्रविष्टेन = स्थितेन, अन्तरम् = बहिर्गमनाय छिद्रम् अन्तरम् = उपायः, कृपणवेष्टितम् = नीचकृत्यम्, पातयिष्यामि = स्थापयिष्यामि, आरोपयिष्यामीति भावः, संभाव्यते = युज्यते, मोटयित्वा = निष्पीड्य, व्यवहारम् = विवादम्, व्यवहारस्य = विवादस्य, पराधीनतया = परायततया, वादिप्रभृतीनाम्, चित्तस्य = मनोगतभावस्य, ग्रहणम् = ज्ञानम्, दुष्करम् = अतिकठिनम् ।।