मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५०८ | मृच्छकटिकम्
छन्नं कार्यमुपक्षिपन्ति पुरुषा न्यायेन दूरीकृतं स्वान् दोषान् कथयन्ति नाधिकरणे रागाभिभूताः स्वयम् । तैः पक्षापरपक्षवर्द्धितबलैर्दोषैर्नृपः स्पृश्यते संक्षेपादपवाद एव सुलभो द्रष्टुर्गुणो दूरतः ॥ ३ ॥
**अन्वयः—**पुरुषाः, न्यायेन, दूरीकृतम्, कार्यम्, छन्नम्, उपक्षिपन्ति, स्वयम्, दोषान्, अधिकरणे, न, कथयन्ति, पक्षापर-पक्षवर्द्धित-बलैः, तैः, दोषैः, नृपः, स्पृश्यते, संक्षेपात्, द्रष्टुः, अपवादः, एव, सुलभः, गुणः, दूरतः, [ तिष्ठति ] ॥ ३ ॥
**शब्दार्थः—**पुरुषाः=लोग, न्यायेन=न्याय से, दूरीकृतम्=दूर किये हुये, रहित, कार्यम्=कार्य को, बात को, छन्नम्=छिपा हुआ (बना कर), उपक्षिपन्ति=उपस्थित करते हैं, स्वयम् = अपने आप, रागाभिभूताः = विषयासक्ति से आक्रान्त, (होने के कारण), स्वान्=अपने, दोषान् = दोषों को, अधिकरणे = न्यायालय में, न=नहीं, कथयन्ति = कहते हैं, प्रकट करते हैं। पक्षापरपक्षवर्द्धितबलैः=वादी और प्रतिवादी दोनों पक्षों के लोगों द्वारा बढ़ाये गये बल वाले = प्रामाण्यवाले, तैः तैः = उन उन, दोषैः = दोषों से, नृपः=राजा, स्पृश्यते=स्पृष्ट होता है, दूषित होता है, संक्षेपात्=संक्षेप से, (यह कहा जा सकता है कि) द्रष्टुः = मुकदमा देखने वाले, निर्णयकर्ता को, अपवादः = कलंक, एव=ही, सुलभः=सरलतया प्राप्तव्य है, गुणः = यश तो, दूरतः = दूर ही, है ॥ ३ ॥
**अर्थ—**लोग (वादी प्रतिवादी गवाह आदि) न्याय से रहित अर्थात् गलत काम को छिपा कर [निर्णय के लिये] उपस्थापित करते हैं। स्वयम् विषयासक्त [क्रोध लोभादि के वशीभूत] होते हुये अपने दोषों को न्यायालय में नहीं प्रकट करते हैं। (इस कारण) वादी और प्रतिवादी दोनों पक्षों के द्वारा बढ़ाये गये बल वाले [प्रामाण्य वाले] उन-उन दोषों से राजा छुआ जाता है, [दूषित होता है] संक्षेप में, मुकदमें की सुनवाई करने वाले न्यायाधीश को कलंक मिलना ही सरल है, यश प्राप्त होना दूर की बात ॥ ३ ॥
**टीका—**निर्णयकर्तुर्निन्दाप्राप्तिहेतुं निर्दिशति —छन्नमिति । पुरुषाः=वादिनः, प्रतिवादिनः, साक्ष्यादयश्च, न्यायेन=नीत्या, औचित्येन वा, दूरीकृतम्=रहितम्, निराकृतम्, कार्यम्=अभियोगविषयीभूतं वस्तु, छन्नम्=शाठ्यादिनाच्छादितम् असत्या-वृत्तम्, उपक्षिपन्ति=आवेदयन्ति, स्वयम्=आत्मना, रागाभिभूताः=विषयासक्त्या आक्रान्ताः, निर्विवेकाः सन्तः, अधिकरणे=न्यायालये, स्वान्=आत्मीयान्, दोषान्=अपराधान्, न=नैव, कथयन्ति=प्रकाशयन्ति । पक्षापरपक्षवर्द्धितबलैः=पक्षः=वादि-जनीयपक्षः, अपरपक्षः=प्रतिवादिजनीयपक्षः, ताभ्यामुभाभ्यां वर्द्धितम्=पोषितम्