भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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५१२ | मृच्छकटिकम्

अधिकरणिकः - भद्र शोधनक ! अधिकरणमण्डपस्य मार्गमादेशय ।

शोधनकः - एदु एदु अधिअरणभोइओ एदु । ( एतु एतु अधिकरणभोजक एतु । )

( इति परिक्रामन्ति । )

शोधनकः - एदं अधिअरणमण्डवं, ता पविसन्तु अधिअरणभोइआ । ( अयमधिकरणमण्डपः, तत्प्रविशन्तु अधिकरणभोजकाः । )

( सर्वे च प्रविशन्ति । )

अधिकरणिकः - भद्र शोधनक ! बहिनिष्क्रम्य ज्ञायताम्—कः कः कार्यार्थी इति ।

शोधनकः - जं अज्जो आणवेदि (इति निष्क्रम्य) अज्जा ! अधिअरणिआ भणन्ति—'को को इध कज्जत्थी' त्ति । ( यदार्य आज्ञापयति । ) ( आर्याः ! अधिकरणिका भणन्ति —'कः कः इह कार्यार्थी' इति ? )

शकारः - ( सहर्षम् ) उवत्थिदे अधिअलणिए । ( साटोपं परिक्रम्य ) हग्गे वलपुलिशे मणुश्शे वासुदेवे लट्टिशशाले लाअशाले कज्जत्थी । ( उपस्थिताः अधिकरणिकाः । ) ( अहं वरपूरुषः मनुष्यः वासुदेवः राष्ट्रियश्यालः राजश्यालः कार्यार्थी । )


अधिकरणिक - भद्र शोधनक ! अधिकरणमण्डप ( न्यायालय ) का मार्ग बतलाइये ।

शोधनक - आइये, आइये न्यायाधीश जी, आइये ।

( सभी लोग घूमते हैं । )

शोधनक - यह न्यायालय है, अतः न्यायाधिकारी आप लोग इसमें प्रवेश करिये ।

( सभी लोग प्रवेश करते हैं । )

अधिकरणिक - भद्र शोधनक ! बाहर निकल कर पता लगाओ “कौन-कौन मुकदमा के विचारार्थ आया है ।”

शोधनक - जैसी आर्यकी आज्ञा । ( बाहर जाकर ) सज्जनों ! न्यायाधिकारी यह कह रहे हैं कि “किस किस का मुकदमा विचारार्थ है ?”

शकार - ( हर्ष के साथ ) न्यायाधिकारी आ गये । ( घमण्ड के साथ घूम-कर ) मैं श्रेष्ठ पुरुष, मनुष्य, वासुदेव, राष्ट्रिय शाला, राजा का शाला मुकदमा के विचारार्थ उपस्थित हूँ ।