भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

पृष्ठ 601, कुल 760 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 601

नवमोऽङ्कः ५१३

शोधनकः-(ससम्भ्रमम्) हीमादिके ! पढमं ज्जेव रट्टिअशालो कज्जत्थी । भोदु, अज्ज ! मुहुत्तं चिट्ठ, दाव अधिअरणिश्राणं णिवेदेमि । (उपगम्य) अज्ज ! एसो क्खु रट्टिअशालो कज्जत्थी ववहारे उवत्थिदो । (हन्त ! प्रथममेव राष्ट्रियश्यालः कार्यर्थी । भवतु, आर्य ! मुहूर्तं तिष्ठ, तावदधिकरणिकानां निवेदयामि ।) (आर्याः ! एष खलु राष्ट्रियश्यालः कार्यार्थी व्यवहारे उपस्थितः ।)

अधिकरणिकः-कथं, प्रथममेव राष्ट्रियश्यालः कार्यार्थी । यथा—

सूर्योदये उपरागो महापुरुषविनिपातमेव कथयति । शोधनक ! व्याकुलेनाद्य व्यवहारेण भवितव्यम् ! भद्र ! निष्क्रम्य उच्यताम्-'गच्छ, अद्य न दृश्यते तव व्यवहार इति' ।

शोधनकः-जं अज्जो आणवेदि । (इति निष्क्रम्य शकारमुपगम्य) अज्ज ! अधिअरणिया भणन्ति-'अज्ज गच्छ, ण दीशदि तव ववहारो ।' (यदार्य आज्ञापयति ।) (आर्य ! अधिकरणिका भणन्ति-'अद्य गच्छ, न दृश्यते तव व्यवहारः ।')

शकारः-(सक्रोधम्) आः ! किं ण दीशदि मम ववहाले ? जइ ण दीशदि, तदो आउत्तं लाआणं पालअं वहिणीवदिं विष्णविअ बहिणिं अत्तिकं च विष्णविअ एदं अधिअलणिअं दूले फेलिअ एत्थ अण्णं अधिअलणिअं ठावइश्शं । (इति गन्तुमिच्छति) आः ! किं न दृश्यते मम व्यवहारः ? यदि न दृश्यते, तदा आवुत्तं राजानं पालकं भगिनीपतिं विज्ञाप्य भगिनीं मातरञ्च विज्ञाप्य एतमधिकरणिकं दूरीकृत्य अत्र अन्यमधिकरणिकं स्थापयिष्यामि ।)


शोधनक-(घबड़ाहट के साथ) हाय ! सबसे पहले राजा का शाला ही मुकदमा के लिये आया है । अच्छा, आर्य ! कुछ देर रुकिये जब तक मैं अधिकरणिकों से निवेदन करता हूँ । (पास जाकर) श्रीमन् ! यह राजा का शाला मुकदमा के विचार के लिये आया है ।

अधिकरणिक-क्या, सबसे पहले राजा का शाला ही मुकदमा के लिये आया है ? जैसे सूर्योदय में सूर्यग्रहण महापुरुष के विनाश को कहता है, सूचित करता है । शोधनक ! आज मुकदमा परेशानी से भरा हुआ होगा । भद्र ! निकल कर कह दो-'जाओ, आज तुम्हारे मुकदमा पर विचार नहीं होगा ।'

शोधनक-जैसी आर्य की आज्ञा । (निकल कर शकार के पास जाकर) आर्य ! अधिकरणिक यह कह रहे हैं-'आज जाइये, तुम्हारे मुकदमे पर विचार नहीं होगा ।'

शकार-(क्रोध के साथ) क्या, मेरे मुकदमा पर विचार नहीं होगा ? यदि विचार नहीं होगा तब अपने बहनोई जीजा राजा पालक से कह कर और बहन तथा माता से कह कर इस अधिकरणिक को हटवा कर दूसरे अधिकरणिक को नियुक्त करवाऊँगा ।

३३ मृ०