मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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शोधनक --अज्ज रट्टिअशालअ ! मुहुत्तअं चिट्ठ, दाव अधिअरणियाणं णिवेदेमि । ( अधिकरणिकमुपगम्य ) एसो रट्टिअशालो कुविदो भणादि । (आर्य राष्ट्रियश्याल ! मुहूर्तकं तिष्ठ, तावदधिकरणिकानां निवेदयामि ।) ( एष राष्ट्रियश्यालः कुपितो भणति । ) ( इति तदुक्तं भणति । )
अधिकरणिकः--सर्वमस्य मूर्खस्य सम्भाव्यते । भद्र ! उच्यताम्--'आगच्छ, दृश्यते तव व्यवहारः ।'
शोधनकः--(शकारमुपगम्य) अज्ज ! अधिअरणिया भणन्ति-आअच्छ दीशदि तव ववहारो ! ता पविसदु अज्जो । ( आर्य ! अधिकरणिका भणन्ति--'आगच्छ, दृश्यते तव व्यवहारः । तत् प्रविशतु आर्यः । )
शकारः--पढमं भणन्ति--'ण दीशदि, शम्पदं दीशदि' त्ति । ता णाम भीदभीदा अधिअलणभोइआ । जेत्तिअं हग्गे भणिश्शं तेत्तिअं पत्तिआवइश्शं । भोदु, पविशामि । ( प्रविश्योपसृत्य ) शुशुहं अम्हाणं, तुम्हाणं पि शुहं देमि ण देमि अ । (प्रथमं भणन्ति 'न दृश्यते, साम्प्रतं दृश्यते' इति । तत् नाम भीतभीता अधिकरणभोजकाः ! यावदहं भणिष्यामि, तावत् प्रत्याययिष्यामि ।) ( सुसुखमस्माकम्, युष्माकमपि सुखं ददामि न ददामि च । )
अधिकरणिकः--( स्वगतम् ) अहो ! स्थिरसंस्कारता व्यवहारार्थिनः । ( प्रकाशम् ) उपविश्यताम् ।
शोधनक--आर्य राजा के शाले ! कुछ देर रुकिये, जब तक अधिकरणिकों से निवेदन करता हूँ । ( अधिकरणिक के पास जाकर ) यह राजा का शाला नाराज होकर कह रहा है । ( यह कह कर उसके द्वारा कही बात दोहरा देता है । )
अधिकरणिक--इस मूर्ख के लिये सब कुछ सम्भव है । भद्र ! जाकर कह दो--'आइये, तुम्हारे मुकदमे पर विचार किया जायेगा ।'
शोधनक--( शकार के पास जाकर ) आर्य ! अधिकरणिक कह रहे हैं--आइये, तुम्हारे मुकदमे पर विचार किया जायगा । अतः आर्य प्रवेश करें ।
शकार--पहले कहते हैं 'नहीं देखा जायेगा, अब देखा जायगा ।' इसलिये अधिकरणिक बहुत डर गये हैं । जितना कहूँगा, उतना सच मनवा लूँगा । ( प्रवेश करके पास जाकर ) हमारा अच्छी तरह सुख है । तुम लोगों को भी सुख देता हूँ अथवा नहीं देता हूँ ।
अधिकरणिक--(अपने में) मुकदमा का न्याय चाहने वाले इसकी निर्भीकता आश्चर्यजनक है । ( प्रकट रूप में ) बैठिये ।