मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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अधिकरणिकः-- अथ ज्ञायते का स्त्री विपन्नेति ?
शकारः-- हंहो अधिकलणभोइआ ! किं त्ति ण जाणामि तं तादिशि णअलमण्डणं कञ्चणशदभूशणिअं । केण वि कुपुत्तेण अत्थकल्लवत्तश्श कालणादो शुण्णं पुप्फकलण्डकं जिण्णुज्जाणं पविशिअ बाहुपाश-वलक्कारेण वशन्तशोणिआ मालिदा, ण मए । (अहो अधिकरणभोजकाः ! किमिति न जानामि तां तादृशीं नगरमण्डनं काञ्चनशतभूषणाम् । केनापि कुपुत्रेण अर्थकल्य-वर्त्तस्य कारणात् शून्यं पुष्पकरण्डकं जीर्णोद्यानं प्रवेश्य बाहुपाशबलात्कारेण वसन्त-सेना मारिता, न मया ।) (इत्यर्द्धोक्ते मुखमावृणोति ।)
अधिकरणिकः-- अहो नगररक्षिणां प्रमादः ! भोः श्रेष्ठिकायस्थौ ! 'न मयेति' व्यवहारपदं प्रथममभिलिख्यताम् ।
कायस्थः-- जं अज्जो आणवेदि । (तथा कृत्वा) अज्ज ! लिहिदं । (यदार्थ आज्ञापयति ।) (आर्य ! लिखितम् ।)
शकारः-- (स्वगतम्) हीमादिके ! उत्तलाअन्तेण विअ पाअशपिण्डा-लकेण अज्ज मए अत्ता एव्व णिण्णाशिदो । भोदु, एवं दाव । (प्रकाशम्) अहो अधिकलणभोइआ ! णं भणामि, मए ज्जेव दिट्ठा, किं कोलाहलं कलेध ? (हन्त ! उत्ताम्यतेव पायसपिण्डारकेण अद्य मया आत्मैव निर्णशितः । भवतु, एवं तावत्) । (अहो अधिकरणभोजकाः ! ननु भणामि - मयैव दृष्टा । किं कोलाहलं कुरुत ?) (इति पादेन लिखितं प्रोञ्छति ।)
अधिकरणिक-- अच्छा, कुछ मालुम पड़ता है कि वह कौन स्त्री मरी पड़ी है ?
शकार-- अहो न्यायाधीश महोदय ! नगर की भूषण, सैकड़ों स्वर्णभूषणों से युक्त उस सुन्दरी को क्यों नहीं जानूँगा ? किसी दुष्ट व्यक्तिने कलेवा के समान तुच्छ धन के लिये सूने पुष्पकरण्डक बगीचे में लेजाकर बाहुपाश से बलपूर्वक (हाथों से गला दबाकर) वसन्तसेना को मार डाला, मैंने नहीं । [ऐसा आधा कह कर मुख को छिपा लेता है ।]
अधिकरणिक-- ओह ! नगर के रक्षकों (सिपाहियों) की असावधानी । हे श्रेष्ठी और कायस्थ ! 'मैंने नहीं' ये मुकदमे के पद पहले लिख दो ।
कायस्थ-- श्रीमान् की जैसी आज्ञा । (लिखकर) आर्य ! लिख लिया ।
शकार-- (अपने में) हाय ! जल्दीबाजी करते हुये (उतावला होते हुये) मैंने गरम गरम खीर खाने वाले के समान आज अपना ही नाश कर डाला । अच्छा, ऐसा हो । (प्रकट रूप में) हे न्यायाधिकारियो ! कहता हूँ कि मैंने ही देखा है । क्या कोलाहल कर रहे हो ? (ऐसा कह कर लिखी बात को पैर से पोंछ डालता है ।)