भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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५२०मृच्छकटिकम्

श्रेष्ठिकायस्थौ--भोः ! कं इसो बवहारो अवलम्बदि ? ( भोः ! कमेव व्यवहारोऽवलम्बते ? )
अधिकरणिकः--इह हि द्विविधो व्यवहारः ।
श्रेष्ठिकायस्थौ--केरिसो ? ( कीदृशो ? )
अधिकरणिकः--वाक्यानुसारेण अर्थानुसारेण च । यस्तावत् वाक्यानुसारेण, स खल्वर्थिप्रत्यर्थिभ्यः, यश्चार्थानुसारेण, स चाधिकरणिकबुद्धि-निष्पाद्यः ।
श्रेष्ठिकायस्थौ--ता वसन्तसेणामादरं अवलम्बदि ववहारो ? ( तद् वसन्तसेनामातरमवलम्बते व्यवहारः ? )
अधिकरणिकः--एवमिदम् । भद्र शोधनक ! वसन्तसेनामातरमनुद्वे-जयन्नाह्वय ।

शकार को अपनी गलती का आभास हो जाता है कि उसे ऐसा नहीं कहना चाहिये था। ऐसा कह कर अपने को दोषी सूचित कर दिया है। इसी लिये आगे कहता है कि गरम-गरम खीर खाने का लोभी जैसे जल्दबाजी में अपनी जीभ जला डालता है, उसी प्रकार उसने भी गलत बयान देकर अपना विनाश कर डाला है।

निर्णाशितः-- यहाँ णत्व होता है ‘उपसर्गादसमासेऽपि’। णत्वरहित प्रयोग अशुद्ध है।

शब्दार्थ-- व्यवहारः=विचारणीय विषय, वाक्यानुसारेण = वादी-प्रतिवादी की बातों के अनुसार, अर्थानुसारेण=बातें सुनकर उनके अभिप्राय को समझ कर निर्णय करना, अनुद्वेजयन् = विना परेशान करते हुये, यौवनम् = यौवनसुख, मोहपरवशम् इव=मूर्च्छित जैसी, भावमिश्राणाम्=सम्मानयोग्य लोगों का, प्रच्छनीयः=पूछने योग्य।

अर्थ--श्रेष्ठी और कायस्थ-- श्रीमन् ! यह मुकदमा किस पर आश्रित है ?
अधिकरणिक-- यहाँ दो प्रकार का व्यवहार [ विचारणीय ] है।
श्रेष्ठी और कायस्थ-- कौन-कौन से ?
अधिकरणिक-- वाक्यों के अनुसार और अर्थ के अनुसार। जो वाक्यों=बयानों के अनुसार होता है वह वादी-प्रतिवादी के बयानों से समझा जाता है, और जो अर्थ के अनुसार होता है वह अधिकरणिक की बुद्धि से निर्णय करने लायक होता है।
श्रेष्ठी और कायस्थ-- तब तो वसन्तसेना की माता पर यह व्यवहार आश्रित है।
अधिकरणिक-- ऐसा ही है। भद्र शोधनक ! उद्वेगयुक्त न करते हुये वसन्तसेना की माता को बुलाओ।

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