मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
पृष्ठ 609, कुल 760 में से
संदर्भ में पढ़ेंनवमोऽङ्कः ५२१
**शोधनकः—**तहा। (इति निष्क्रम्य गणिकामात्रा सह प्रविश्य) एदु एदु अज्जा। (तथा।) (एतु एतु आर्या।)
**वृद्धा—**गदा मे दारिआ मित्तघरं अत्तणो जोव्वणं अणुभविदुं। एसो उण दीहाऊ भणादि—'आअच्छ, अधिअरणिओ सद्दावेदि।' ता मोहपरवसंविव अत्ताणं अवगच्छामि, हिअअं मे थरथरेदि। अज्ज! आदेसेहि मे अधिअरणमण्डवस्स मग्गं। (गता मे दारिका मित्रगृहमात्मनो यौवनमनुभवितुम्। एष पुनर्दीर्घायुर्भणति—'आगच्छ, अधिकरणिकः शब्दापयति (आकारयति)।' तन्मोहपरवशमिवात्मानमवगच्छामि हृदयं थरथरायते (कम्पते)। आर्य! आदिश मे अधिकरणमण्डपस्य मार्गम्।)
**शोधनकः—**एदु एदु। (एतु एतु आर्या।)
(उभौ परिक्रामतः)
**शोधनकः—**एदं अधिअरणमण्डवं, एत्थ पविसदु अज्जा। (अयमधिकरणमण्डपः, अत्र प्रविशतु आर्या।)
(इत्युभौ प्रविशतः।)
वृद्धा—(उपसृत्य) सुहं तुम्हाणं भोदु भावमिस्साणं। (सुखं युष्माकं भवतु भावमिश्राणाम्।)
अधिकरणिकः भद्रे! स्वागतम्। आस्यताम्।
**वृद्धा—**तथा। (तथा।) (इत्युपविष्टा।)
**शोधनक—**जैसी आज्ञा। (यह कहकर निकल कर वसन्तसेना की माता के साथ प्रवेश करके) आइये आर्या आइये।
**वृद्धा—**मेरी बेटी (वसन्तसेना) अपने मित्र (चारुदत्त) के घर जवानी का सुख उठाने के लिये गयी है। और यह दीर्घायु कह रहा है 'आइये, अधिकरणिक बुला रहे हैं', इसलिये अपने को बेहोश सी समझ रही हूँ। मेरा दिल कांप रहा है। आर्य! मुझे कचहरी का रास्ता बताओ।
**शोधनक—**आइये आर्या आइये।
(दोनों घूमते हैं।)
**शोधनक—**यह कचहरी है। इसमें आर्या प्रवेश करें।
(यह कह कर दोनों प्रवेश करते हैं।)
वृद्धा—(पास जाकर) सम्माननीय सज्जनों! आपका कल्याण हो।
**अधिकरणिक—**भद्रे! स्वागत है। बैठिये।
**वृद्धा—**अच्छा। (ऐसा कह कर बैठ जाती है।)