भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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५२२ मृच्छकटिकम्

शकारः—( साक्षेपम् ) आगदाशि वुड्ढकुट्टणि ! आगदाशि । ( आगतासि वृद्धकुट्टनि ! आगतासि ? )
अधिकरणिकः— अये ! तत् त्वं किल वसन्तसेनाया माता ?
वृद्धा— अध इं ? ( अथ किम् ? )
अधिकरणिकः— अथेदानीं वसन्तसेना क्व गता ?
वृद्धा— मित्तघरं । ( मित्रगृहम् । )
अधिकरणिकः— किं नामधेयं तस्या मित्रम् ?
वृद्धा—( स्वगतम् ) हद्धी हद्धी अदिलज्जणीअं क्खु एदं । ( प्रकाशम् ) जणस्स पुच्छणीओ अअं अत्थो, ण उण अधिअरणस्स । ( हा धिक् हा धिक्, अतिलज्जनीयं खल्वेतत् । ) ( जनस्य प्रच्छनीयोऽयमर्थः, न पुनरधिकरणिकस्य । )
अधिकरणिकः— अलं लज्जया, व्यवहारस्त्वां पृच्छति ।
श्रेष्ठिकायस्थौ— ववहारो पुच्छदि, णत्थि दोसो, कधेहि । ( व्यवहारः पृच्छति, नास्ति दोषः, कथय । )
वृद्धा— कथं ववहारो ? जइ एव्वं, ता सुणन्तु अज्जमिस्सा । सो क्खु, सत्यवाह-विणअदत्तस्स णत्तिओ, साअरदत्तस्स तणओ, सुगहिदणा-महेओ अज्ज चारुदत्तो णाम सेट्ठिचत्तरे पडिवसदि; तहिं मे दारिआ जोव्वणसुहं अणुभवदि । ( कथं व्यवहारः ? यद्येवं तदा शृण्वन्तु आर्यमिश्राः । स खलु सार्थवाहविनयदत्तस्य नप्ता, सागरदत्तस्य तनयः, सुगृहीतनामधेय आर्यचारुदत्तो नाम श्रेष्ठिचत्वरे प्रतिवसति, तत्र मे दारिका यौवनसुखमनुभवति । )


शकार—( आक्षेपसहित ) आ गयी हो बूढ़ी कुट्टिनी, आ गई हो ?
अधिकरणिक— अरे ! तो तुम क्या वसन्तसेना की माता हो ?
वृद्धा— जी हाँ ।
अधिकरणिक— इस समय वसन्तसेना कहाँ गयी है ?
वृद्धा— मित्र के घर ।
अधिकरणिक— उसके मित्र का क्या नाम है ?
वृद्धा—(अपने में) हाय ! हाय ! यह तो अति लज्जा की बात है । (प्रकट में) यह बात तो साधारण लोगों के द्वारा पूछने की है, न कि न्यायाधिकारियों के द्वारा ।
अधिकरणिक— लजाने की कोई बात नहीं है । यह तो मुकदमा पूछ रहा है ।
श्रेष्ठो और कायस्थ— मुकदमा पुछवा रहा है, कोई दोष नहीं है, कहो कहो ।
वृद्धा— क्या मुकदमा ? यदि ऐसी बात है तो सज्जनों ! सुनिये । सार्थवाह-विनयदत्त के नाती ( पौत्र ), सागरदत्त के पुत्र, स्वनामधन्य आर्य चारुदत्त श्रेष्ठियों के मुहल्ले में रहते हैं । वहाँ मेरी बेटी जवानी का सुख उठा रही है ।