मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनवमोऽङ्कः ५३३
भवताम् ?
अधिकरणिकः — (ससम्भ्रमम्) स्वागतमार्यस्य। भद्र शोधनक ! आर्यस्यासनमुपनय ।
शोधनकः — (आसनमुपनीय) एदं आसणं, एत्थ उवविसदु अज्ज। (इदमासनम्, अत्रोपविशतु आर्यः।)
(चारुदत्त उपविशति।)
शकारः — (सक्रोधम्) आगदेशि ले इत्थिआघादआ ! आगदेशि ? अहो ! णाए ववहाले ! अहो ! धम्मे ववहाले ! जं एदाह-इत्थिआघादकाह आशणे दीअदि (सगर्वम्) भोदु, णं दीअदु। (आगतोऽसि रे स्त्रीघातक ! आगतोऽसि ? अहो ! न्याय्यो व्यवहारः ! अहो ! धर्म्यो व्यवहारः, यदेतस्मै स्त्रीघातकाय आसनं दीयते। भवतु, ननु दीयताम्।)
अधिकरणिकः — आर्यचारुदत्त ! अस्ति भवतोऽस्या आर्याया दुहित्रा सह प्रसक्तिः, प्रणयः प्रीतिर्वा ?
चारुदत्तः — कस्याः ?
अधिकरणिकः — अस्याः। (इति वसन्तसेनामातरं दर्शयति।)
चारुदत्तः — (उत्थाय) आर्ये ! अभिवादये।
वृद्धा — जाद ! चिरं मे जीव। (स्वगतम्) अअं सो चारुदत्तो। सुणिक्खित्तं खु दारिआए जोव्वणं।
(जात ! चिरं मे जीव।) (अयं स चारुदत्तः। सुनिक्षिप्तं खलु दारिकाया यौवनम्।)
आप लोगों का कुशल तो है ?
अधिकरणिक — (घबड़ाकर, जल्दी से) आर्य का स्वागत है। भद्र शोधनक ! आर्यचारुदत्त के लिये आसन (कुर्सी) लाओ।
शोधनक — (आसन लाकर) यह आसन है। श्रीमान् ! इस पर बैठिये।
(चारुदत्त बैठ जाता है।)
शकार — (गुस्सा के साथ) अरे, औरत के हत्यारे ! आ गये हो, आ गये हो ? यह न्याययुक्त व्यवहार है जो इस औरत के हत्यारे को बैठने का आसन दिया जा रहा है ? (घमण्ड से) अच्छा, दे दीजिये।
अधिकरणिक — आर्य चारुदत्त ! इस वृद्धा की लड़की के साथ आपका लगाव, प्रेम या विशेष अनुराग है ?
चारुदत्त — किस की ?
अधिकरणिक — इसकी। (यह कहकर वसन्तसेना की माता को दिखाता है।)
चारुदत्त — (उठकर) आर्ये ! प्रणाम करता हूँ।
वृद्धा — बेटा ! चिरंजीवी रहो। (अपने में) यही वे चारुदत्त हैं। मेरी