भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

पृष्ठ 625, कुल 760 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 625

नवमोऽङ्कः ५३७

चारुदत्तः—( स्वगतम् ) किं प्रच्छन्नं गतेति ब्रवीमि ? श्रेष्ठिकायस्थौ--अज्ज ! कहेहि । ( आर्य कथय । ) चारुदत्तः—गृहं गता । किमन्यत ब्रवीमि । शकारः--ममकेलकं पुफ्फकरण्डकंजिण्णुज्जाणं पवेशिअ, अत्थणि- मित्तं बाहु-पाश-बलक्कालेण मालिदा । अए ! शम्पदं वदशि घलं गदेत्ति । ( मदीयं पुष्पकरण्डकजीर्णोद्यानं प्रवेश्य अर्थनिमित्तं बाहुपाशबलात्कारेण मारिता । अये ! साम्प्रतं वदसि--गृहं गतेति । ) चारुदत्तः--आः असम्बद्धप्रलापिन् !

अभ्युक्षितोऽसि सलिलैर्न बलाहकानां
चाषाग्रपक्षसदृशं भृशमन्तराले ।
मिथ्यैतदाननमिदं भवतस्तथापि
हेमन्तपद्ममिव निष्प्रभतामुपैति ॥ १६ ॥


चारुदत्त--( अपने में ) क्या यह कह दूँ कि छिपी हुयी गयी ?
श्रेष्ठी और कायस्थ--आर्य ! बताइये ।
चारुदत्त--घर गई। और क्या बताऊँ ।
शकार--मेरे पुष्पकरण्डक नामक जीर्ण उद्यान में ले जाकर धन के ( लोभ के ) कारण हाथों से गला दबाकर मार डाला । अरे ! इस समय कह रहे हो--'घर गयी है ।'

अन्वयः--अन्तराले, बलाहकानाम्, सलिलैः, चाषाग्रपक्षसदृशम्, भृशम्, न अभ्युक्षितः, असि, तथापि, भवतः, इदम्, आननम्, हि, हेमन्तपद्मम, इव, निष्प्रभ-ताम्, उपैति, अतः, एतत्, मिथ्या, अस्ति ॥ १६ ॥

शब्दार्थ--अन्तराले=अन्तरीक्ष में, बलाहकानाम्=बादलों के, सलिलैः=पानी से, चाषाग्रपक्षसदृशम्=चातक पक्षी के पंख के अग्रभाग के समान, भृशम्=अच्छी तरह, न=नहीं, अभ्युक्षितः=भीगे हुये, असि=हो, तथापि=फिर भी, भवतः=आपका, इदम्=यह, आननम्=मुँह, चेहरा, हि=निश्चितरूप से, हेमन्तपद्मम्=हेमन्त ऋतु के कमल, इव=के समान, निष्प्रभताम्=कान्तिहीनता को, उपैति=प्राप्त कर रहा है ॥ १६ ॥

अर्थ--चारुदत्त --ओह अनर्गलबकवादी !
अन्तरीक्ष में बादलों के पानी से चातक पक्षी के पंख के अग्रभाग की तरह खूब नहीं भीगे हो, फिर भी तुम्हारा यह मुंह हेमन्त ऋतु में कमल के समान मुरझाया हुआ हो रहा है अतः तुम्हारा यह कहना झूठ है ॥ १६ ॥

टीका--शकारस्य निष्प्रभं मुखं तस्यापराधित्वं व्यनक्तीति प्रतिपादयति चारुदत्तः - अभ्युक्षितेति । अन्तराले=अन्तरीक्षे, बलाहकानाम्=मेघानाम्, सलिलैः