भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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५३६मृच्छकटिकम्

अलं लज्जया, व्यवहारस्त्वां पृच्छति।
**चारुदत्तः—**अधिकृत ! केन सह मम व्यवहारः ?
शकारः—(साटोपम्) अले ! मए शह ववहाले। (अरे ! मया सह व्यवहारः ।)
**चारुदत्तः—**त्वया सह मम व्यवहारः सुदुःसहः ।
**शकारः—**अले इत्थिआघादा ! तं तादिशिं लअणशदभूशणिअं वशन्त-शेणिअं मालिअ, शम्पदं कवड़कावड़िके भविअ णिगूहेशि ? ( अरे स्त्री-घातक ! तां तादृशीं रत्न-शत-भूषणिकां वसन्तसेनां मारयित्वा, साम्प्रत कपटका-पटिको भूत्वा निगूहसि । )
**चारुदत्तः—**असम्बद्धः खल्वसि ।
**अधिकरणिकः—**आर्य चारुदत्त ! अलमनेन । ब्रूहि सत्यम् । अपि गणिका तव मित्रम् ?
**चारुदत्तः—**एवमेव ।
**अधिकरणिकः—**आर्य ! वसन्तसेना क्व ?
**चारुदत्तः—**गृहं गता ।
**श्रेष्ठिकायस्थौ—**कधं गदा ? कदा गदा ? गच्छन्ती वा केण अणुगदा ? ( कथं गता ? कदा गता ? गच्छन्ती वा केन अनुगता ? )


**अर्थ—**लजाने की कोई बात नहीं है । विचारणीय अभियोग तुमसे पूछ रहा है ।
**चारुदत्त —**न्यायाधिकारिन् ! किसके साथ मेरा मुकदमा है ?
शकार —( घमण्ड से ) अरे ! मेरे साथ तुम्हारा मुकदमा है ।
**चारुदत्त —**तुम्हारे साथ मेरा मुकदमा अति कष्ट से सहन करने योग्य है अर्थात् मैं नहीं सह सकता ।
**शकार—**अरे औरत के हत्यारे ! अरे, उस प्रकार की सैंकड़ों रत्नों से सजी हुई वसन्तसेना को मार कर इस समय कपटपूर्वक छिपाने वाले बनकर [ अपना अपराध ] छिपा रहे हो ।
चारुदत्त — तुम ऊटपटांग बोलने वाले हो ।
**अधिकरणिक—**आर्य चारुदत्त ! इन बेकार की बातों से क्या ? सच सच बताइये, गणिका आपकी मित्र है ?
**चारुदत्त—**हाँ, ऐसा ही है ।
**अधिकरणिक—**आर्य ! वसन्तसेना कहाँ है ?
**चारुदत्त—**घर गयी है ।
**श्रेष्ठो ओर कायस्थ—**कैसे गयी ? कब गयी ? और किसके साथ साथ गयी ?