भारतकोश
संग्रह पर लौटें

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ
५३६मृच्छकटिकम्

अलं लज्जया, व्यवहारस्त्वां पृच्छति।
**चारुदत्तः—**अधिकृत ! केन सह मम व्यवहारः ?
शकारः—(साटोपम्) अले ! मए शह ववहाले। (अरे ! मया सह व्यवहारः ।)
**चारुदत्तः—**त्वया सह मम व्यवहारः सुदुःसहः ।
**शकारः—**अले इत्थिआघादा ! तं तादिशिं लअणशदभूशणिअं वशन्त-शेणिअं मालिअ, शम्पदं कवड़कावड़िके भविअ णिगूहेशि ? ( अरे स्त्री-घातक ! तां तादृशीं रत्न-शत-भूषणिकां वसन्तसेनां मारयित्वा, साम्प्रत कपटका-पटिको भूत्वा निगूहसि । )
**चारुदत्तः—**असम्बद्धः खल्वसि ।
**अधिकरणिकः—**आर्य चारुदत्त ! अलमनेन । ब्रूहि सत्यम् । अपि गणिका तव मित्रम् ?
**चारुदत्तः—**एवमेव ।
**अधिकरणिकः—**आर्य ! वसन्तसेना क्व ?
**चारुदत्तः—**गृहं गता ।
**श्रेष्ठिकायस्थौ—**कधं गदा ? कदा गदा ? गच्छन्ती वा केण अणुगदा ? ( कथं गता ? कदा गता ? गच्छन्ती वा केन अनुगता ? )


**अर्थ—**लजाने की कोई बात नहीं है । विचारणीय अभियोग तुमसे पूछ रहा है ।
**चारुदत्त —**न्यायाधिकारिन् ! किसके साथ मेरा मुकदमा है ?
शकार —( घमण्ड से ) अरे ! मेरे साथ तुम्हारा मुकदमा है ।
**चारुदत्त —**तुम्हारे साथ मेरा मुकदमा अति कष्ट से सहन करने योग्य है अर्थात् मैं नहीं सह सकता ।
**शकार—**अरे औरत के हत्यारे ! अरे, उस प्रकार की सैंकड़ों रत्नों से सजी हुई वसन्तसेना को मार कर इस समय कपटपूर्वक छिपाने वाले बनकर [ अपना अपराध ] छिपा रहे हो ।
चारुदत्त — तुम ऊटपटांग बोलने वाले हो ।
**अधिकरणिक—**आर्य चारुदत्त ! इन बेकार की बातों से क्या ? सच सच बताइये, गणिका आपकी मित्र है ?
**चारुदत्त—**हाँ, ऐसा ही है ।
**अधिकरणिक—**आर्य ! वसन्तसेना कहाँ है ?
**चारुदत्त—**घर गयी है ।
**श्रेष्ठो ओर कायस्थ—**कैसे गयी ? कब गयी ? और किसके साथ साथ गयी ?

नवमोऽङ्कः ५३७

चारुदत्तः—( स्वगतम् ) किं प्रच्छन्नं गतेति ब्रवीमि ? श्रेष्ठिकायस्थौ--अज्ज ! कहेहि । ( आर्य कथय । ) चारुदत्तः—गृहं गता । किमन्यत ब्रवीमि । शकारः--ममकेलकं पुफ्फकरण्डकंजिण्णुज्जाणं पवेशिअ, अत्थणि- मित्तं बाहु-पाश-बलक्कालेण मालिदा । अए ! शम्पदं वदशि घलं गदेत्ति । ( मदीयं पुष्पकरण्डकजीर्णोद्यानं प्रवेश्य अर्थनिमित्तं बाहुपाशबलात्कारेण मारिता । अये ! साम्प्रतं वदसि--गृहं गतेति । ) चारुदत्तः--आः असम्बद्धप्रलापिन् !

अभ्युक्षितोऽसि सलिलैर्न बलाहकानां
चाषाग्रपक्षसदृशं भृशमन्तराले ।
मिथ्यैतदाननमिदं भवतस्तथापि
हेमन्तपद्ममिव निष्प्रभतामुपैति ॥ १६ ॥


चारुदत्त--( अपने में ) क्या यह कह दूँ कि छिपी हुयी गयी ?
श्रेष्ठी और कायस्थ--आर्य ! बताइये ।
चारुदत्त--घर गई। और क्या बताऊँ ।
शकार--मेरे पुष्पकरण्डक नामक जीर्ण उद्यान में ले जाकर धन के ( लोभ के ) कारण हाथों से गला दबाकर मार डाला । अरे ! इस समय कह रहे हो--'घर गयी है ।'

अन्वयः--अन्तराले, बलाहकानाम्, सलिलैः, चाषाग्रपक्षसदृशम्, भृशम्, न अभ्युक्षितः, असि, तथापि, भवतः, इदम्, आननम्, हि, हेमन्तपद्मम, इव, निष्प्रभ-ताम्, उपैति, अतः, एतत्, मिथ्या, अस्ति ॥ १६ ॥

शब्दार्थ--अन्तराले=अन्तरीक्ष में, बलाहकानाम्=बादलों के, सलिलैः=पानी से, चाषाग्रपक्षसदृशम्=चातक पक्षी के पंख के अग्रभाग के समान, भृशम्=अच्छी तरह, न=नहीं, अभ्युक्षितः=भीगे हुये, असि=हो, तथापि=फिर भी, भवतः=आपका, इदम्=यह, आननम्=मुँह, चेहरा, हि=निश्चितरूप से, हेमन्तपद्मम्=हेमन्त ऋतु के कमल, इव=के समान, निष्प्रभताम्=कान्तिहीनता को, उपैति=प्राप्त कर रहा है ॥ १६ ॥

अर्थ--चारुदत्त --ओह अनर्गलबकवादी !
अन्तरीक्ष में बादलों के पानी से चातक पक्षी के पंख के अग्रभाग की तरह खूब नहीं भीगे हो, फिर भी तुम्हारा यह मुंह हेमन्त ऋतु में कमल के समान मुरझाया हुआ हो रहा है अतः तुम्हारा यह कहना झूठ है ॥ १६ ॥

टीका--शकारस्य निष्प्रभं मुखं तस्यापराधित्वं व्यनक्तीति प्रतिपादयति चारुदत्तः - अभ्युक्षितेति । अन्तराले=अन्तरीक्षे, बलाहकानाम्=मेघानाम्, सलिलैः

५३८ मृच्छकटिकम्

अधिकरणिकः-- (जनान्तिकम्)

तुलनञ्चाद्रिराजस्य समुद्रस्य च तारणम् । ग्रहणञ्चानिलस्येव चारुदत्तस्य दूषणम् ॥ २० ॥

जलैः, चाषस्य=स्वर्णवातकस्य अग्रपक्षः=पक्षाग्रम्, तस्य, सदृशम्=तुल्यम्, यथा स्यात् तथा, भृशम्=अत्यधिकम्, न=नैव, अभ्युक्षितः=सिक्तः असि, तथापि=पूर्वोक्तस्थितौ सत्यामपि, भवतः = शकारस्य, इदमाननम्, हेमन्तपद्ममिव = हेमन्ताख्यर्तुसम्भवं कमलमिव, निष्प्रभताम्=मलिनताम्, उपैति=गच्छति । अतः, एतत्=शकारोक्त-मभियोगादिकं सर्वम्, मिथ्या=असत्यमिति तद्भावः । वसन्ततिलकं वृत्तम् ॥ १६ ॥

विमर्शः-इस श्लोक का अभिप्राय कुछ अस्पष्ट है। घबड़ाहट के कारण शकार के माथे पर पसीने की बूंदें निकल आयीं हैं और चेहरा मुरझा गया है। अतः उसका कथन असत्य प्रतीत होता है। क्योंकि बिना वर्षा के माथे पर बूंदें होना अस्वाभाविक है। इसी लिये चारुदत्त कहता है कि स्वर्ण चातक के समान तुम आकाश में नहीं उड़ रहे थे जिससे चेहरे पर पानी की बूंदें दिखाई पड़तीं। अतः अकारण पसीना आना और मुख का मुरझा जाना ही तुम्हारे कथन की असत्यता बता रहे हैं।

कहीं कहीं 'तथापि' के स्थान पर 'तथाहि' ऐसा पाठ है। उनके अनुसार ऐसा अन्वय करना चाहिये—एतत् मिथ्या अस्ति, तथाहि-वलाहकानाम्, सलिलैः, न, अभ्युक्षितः, असि, अन्तराले, चाषाग्रपक्षसदृशम्, भवतः, इदम्, आननम्, हेमन्त-पद्मम्, इव, निष्प्रभताम्, उपैति ॥ १९ ॥

अन्वयः-- अद्रिराजस्य, तुलनम्, समुद्रस्य, तारणम्, अनिलस्य, च, ग्रहणम्, इव, चारुदत्तस्य, दूषणम् ॥ २० ॥

शब्दार्थ-- अद्रिराजस्य=हिमालय को, तुलनम्=तोलना, समुद्रस्य=समुद्र को, तारणम्=तैरना, च=और, अनिलस्य=वायु को, ग्रहणम्=पकड़ना, इव=के समान, चारुदत्तस्य=चारुदत्त को, दूषणम्=दूषित करना है ॥ २० ॥

अर्थ--अधिकरणिक -- (जनान्तिक) हिमालय को तौलने, समुद्र को तैरकर पार करने और हवा को पकड़ने के समान चारुदत्त को दोषी बनाना है। [अर्थात् जैसे ये तीनों असम्भव हैं वैसे ही चारुदत्त का अपराधी होना भी असम्भव है ] ॥ २० ॥

टीका-- चारुदत्तस्य दोषित्वमसम्भवमिदं प्रतिपादयति—तुलनमिति । अद्रि-राजस्य=हिमालयस्य, तुलनम्=तुलया गुरुत्वनिरूपणमिति भावः, समुद्रस्य=सागरस्य, तारणम्=सन्तरणेन अपरपारगमनम्, तथा, अनिलस्य=वायोः, ग्रहणम्=हस्तादिना संयमनम्, इव=तुल्यम्, चारुदत्तस्य, दूषणम्=दोषारोपणम् । एवञ्च यथैतत् त्रितयं

नवमोऽङ्कः ५३९

( प्रकाशम् ) आर्यचारुदत्तः खल्वसौ कथमिदमकार्यं करिष्यति ।
( घोणेत्यादि ३।१६ श्लोकं पठति । )
शकारः--किं पक्खवादेण व्यवहाले दीशदि ? ( किं पक्षपातेन व्यवहारो दृश्यते ? )
अधिकरणिकः--अपेहि मूर्ख ! ।

वेदार्थान् प्राकृतस्त्वं वदसि न च ते जिह्वा निपतिता
मध्याह्ने वीक्षसेऽर्कं न तव सहसा दृष्टिर्विंचलिता ।
दीप्ताग्नौ पाणिमन्तः क्षिपसि स च ते दग्धो भवति नो
चारित्र्याच्चारुदत्तं चलयसि न ते देहं हरति भूः ॥२१॥

लोकेऽसम्भवं तथैव चारुदत्तस्योपरि हत्यारोपणमपि असम्भवमेवेति तद्भावः । अत्र मालोपमालंकारः । पथ्यावक्त्रं वृत्तम् ॥२०॥

विमर्श--जैसे कोई हिमालय को नहीं तौल सकता, तैर कर समुद्र नहीं पार कर सकता, हाथ से हवा नहीं पकड़ सकता उसी प्रकार चारुदत्त पर दोष नहीं लगाया जा सकता। अतः शकारकृत आरोप झूठा है ॥२०॥

अर्थ--( प्रकट रूप में ) ये आर्यचारुदत्त इस अनुचित काम को कैसे कर सकते हैं। ( "ऊँची नाक वाला, अपाङ्ग तक विशाल नेत्र वाला" आदि पूर्वोक्त ३।१६ वाँ श्लोक पढ़ता है ।)

शकार--क्या पक्षपातपूर्ण ढंग से मुकदमा विचारा जा रहा है ?

अन्वयः--त्वम्, प्राकृतः, [सन्] वेदार्थान्, वदसि, ते, जिह्वा, न च, निपतिता, मध्याह्ने, अर्कम्, वीक्षसे, तव, दृष्टिः, सहसा, न, विचलिता, दीप्ताग्नौ, अन्तः, पाणिम्, क्षिपसि, ते, स, च, दग्धः, नो, भवति, चारुदत्तम्, चारित्र्यात्, चलयसि, भूः, ते, देहम्, न, हरति ॥२१॥

शब्दार्थ--त्वम्=तू शकार, प्राकृतः=नीच, सन्=होता हुआ, वेदार्थान्=वेदप्रतिपादित अर्थों को, वदसि=कह रहे हो, ते=तुम्हारी, जिह्वा=जीभ, न च=नहीं, निपतिता=गिरी, मध्याह्ने=दोपहर में, अर्कम्=सूर्य को, वीक्षसे=देख रहे हो, तव=तुम्हारा, दृष्टिः=आँख, सहसा=अचानक, न=नहीं, विचलिता=चौंधिया गई है, दीप्ताग्नेः=जलती आग के, अन्तः=बीच में, पाणिम्=हाथ, क्षिपसि=डाल रहे हो, ते=तुम्हारा, स च=वह, हाथ, दग्धः=जला हुआ, नो=नहीं, भवति=होता है, चारुदत्तम्=चारुदत्त को, चारित्र्यात्=सदाचार से, चलयसि=गिराते हो, भूः=पृथ्वी, ते=तुम्हारी, देहम्=शरीर को, न=नहीं, हरति=हर रही है ॥२१॥

अर्थ--अधिकरणिक--दूर हट जा मूर्ख !

५४० मृच्छकटिकम्

आर्यचारुदत्तः कथमकार्यं करिष्यति।

कृत्वा समुदमुदकोच्छ्रयमात्रशेषं दत्तानि येन हि घनान्यनपेक्षितानि। स श्रेयसां कथमिवैकनिधिर्महात्मा पापं करिष्यति धनार्थमवैरिजुष्टम् ? ।। २२ ।।


तुम नीच होकर वेद के अर्थों को कह रहे हो किन्तु तुम्हारी जीभ नहीं गिर गयी। दोपहर में सूर्य को देख रहे हो, किन्तु तुम्हारी आँख नहीं चौंधिया गयी। जलती हुई आग के बीच में हाथ डाल रहे हो, किन्तु वह जल नहीं रहा है। चारुदत्त को सच्चरित्र से गिरा रहे हो, यह पृथ्वी तुम्हारा हरण नहीं कर लेती है ॥२१॥

टीका--चारुदत्तं दूषयतस्तव शरीरं न नश्यतीति आश्चर्यं व्यनक्ति-वेदार्थेति। त्वम्=शकारः, वेदार्थान्=वेदप्रतिपाद्यार्थान्, वदसि=कथयसि, ते=तव, शकारस्य, जिह्वा=रसना, न च=न हि, निपतिता=स्खलिता, पृथग्भूय भूमौ पतितेति भावः, मध्याह्ने=मध्यन्दिने, अर्कम्=सूर्यम्, वीक्षसे=पश्यसि, तव=शकारस्य, दृष्टिः=चक्षुः, सहसा=अकस्मादेव, न=नैव, विचलिता=उपहता, तथा, दीप्ताग्नेः=प्रज्वलितानलस्य, अन्तः=मध्ये, पाणिम्=हस्तम्, क्षिपसि=पातयसि, ते=तव, स च=तादृशोऽग्नि-मध्यस्थो हस्तः, न=नैव, दग्धः=भस्मीभूतः, भवति=जायते। चारुदत्तम्=एतन्नामकं निर्मलचरित्रम्, चारित्र्यात्=सदाचारात्, चलयसि=भ्रंशयसि, तथापि, भूः=धरा, ते=तव,शकारस्य, देहम्=शरीरम्, नो=नैव, हरति=मुष्णाति। चलधातौमित्त्वेन ह्रस्वतया 'चलयसि' इत्येव रूप शुद्धं बोध्यम् ॥२१॥

अन्वयः--हि, येन, समुद्रम्, उदकोच्छ्रयमात्रशेषम्, कृत्वा, अनपेक्षितानि, धनानि, दत्तानि, श्रेयसाम्, एकनिधिः, सः, महात्मा, धनार्थम्, अवैरिपुष्टम्, पापम्, कथम् इव, करिष्यति ॥२२।

शब्दार्थ--हि=क्योंकि, येन=जिस चारुदत्त ने, समुद्रम्=समुद्र को, उदकोच्छ्रय-मात्रशेषम्=जल का पुञ्जमात्र, कृत्वा=बना कर, अनपेक्षितानि=बिना याचना किये गये, बिन मांगे, धनानि=धन, सम्पत्ति, दत्तानि=दे दिये, बांट दिये, श्रेयसाम्=कल्याणों का, एकनिधिः=एक आश्रय, सः=वह, महात्मा=महान् आत्मा वाला, अति उदार, चारुदत्त, धनार्थम्=धन के लिये, अवैरिजुष्टम्=शत्रुओं द्वारा भी न करने योग्य, पापम्=वसन्तसेना की हत्यारूपी घृणित कर्म, कथम् इव=किस प्रकार, करिष्यति=करेगा ? ॥२२॥

अर्थ--आर्य चारुदत्त अकार्य कैसे कर सकते हैं --

नवमोऽङ्कः । ५४१

वृद्धा—हदास ! जो तदाणिं णासीकिदं सुवण्णभण्डअं रत्तिं चोरेहिं अवहिदं त्ति तस्स कारणादो चदुस्समुद्दसारभूदं रअणावलिं देदि, सो दाणिं अत्थकल्लवत्तस्स कारणादो इमं अकज्जं करेदि ? हा जादे ! एहि मे पुत्ति ! । ( इति रोदिति । ) हताश ! यस्तदानीं न्यासीकृतं सुवर्णभाण्डकं रात्रौ चोरैरपहृतमिति तस्य कारणात् चतुःसमुद्रसारभूतां रत्नावलीं ददाति, स इदानीमर्थकल्यवर्त्तस्य कारणादिदमकार्यं करोति ? हा जाते ! एहि मे पुत्रि ! )

अधिकरणिकःआर्यचारुदत्त ! किमसौ पद्भ्यां गता ? उत प्रवहणेनेति ?


क्योंकि जिसने [ समस्त रत्नों का दान करके ] समुद्र को केवल पानी का पुंज ही बना कर [ याचकों द्वारा ] बिना मागें ही धन सम्पत्तियां दे डालीं । कल्याणों का सबसे बड़ा आश्रय वह महात्मा धन के लिये शत्रुओं द्वारा भी न करने योग्य [ स्त्री-हत्यारूपी ] पाप कर्म कैसे कर सकता ॥२२॥

टीका—विविधगुणालंकृतेन चारुदत्तेन वसन्तसेनाया वधः कर्तुं न शक्य इति प्रतिपादयति—कृत्वेति। हि=यतः, येन=चारुदत्तेन, समुद्रम्=सागरम्, उदकानाम्=जलानाम्, उच्छ्रायः=प्राचुर्यम्, पुञ्जम्=तन्मात्रम्, शिष्यते इति शेषः अवशिष्टो यस्य तम्, जलाधारमात्रमित्यर्थः, कृत्वा=विधाय, तदुद्भूतसर्वरत्नानां दानं कृत्वेति भावः, अनपेक्षितानि=अविचारितानि, धनानि=वित्तानि दत्तानि=सुहृद्भ्यो याचकेभ्यश्च समर्पितानि, श्रेयसाम्=कल्याणानाम् एकनिधिः=एकमात्राश्रयः, महात्मा=महाशयः, सः=चारुदत्तः, उदारचेताः, अवैरिजुष्टम्=शत्रुणापि न सेवितम्, पापम्=वसन्तसेनाबधरूपम् कुकर्म, धनार्थम्=धनापहरणार्थम्, कथमिव=कस्मादिव, करिष्यति=विधास्यति, कथमपि नैव विधास्यतीति भावः । अत्रातिशयोक्तिरलंकारः, वसन्ततिलकं वृत्तम् ॥२२॥

विमर्श—न्यायाधिकारी चारुदत्त की उदारता से सुपरिचित है । चारुदत्त द्वारा धन के लिये वसन्तसेना का वध किया जाना सर्वथा असंभव है ॥२२॥

अर्थवृद्धा—अभागे ! जिसने उस समय धरोहर में रखे गये सोने के भाण्ड को 'रात में चोरों ने चुरा लिया' इस कारण चारों समुद्रों ( से घिरी पृथ्वी ) की सारभूत रत्नावली दे दी, वही इस समय कलेवातुल्य धन के लिये इस अनुचित काम को कैसे कर सकता है ? हाय बेटी ! आओ, मेरी पुत्री ! । ( ऐसा कहकर रोने लगती है । )

अधिकरणिक—आर्य चारुदत्त ! वह वसन्तसेना क्या पैदल गयी अथवा गाड़ी से ?

५४२मृच्छकटिकम्

चारुदत्तः— ननु मम प्रत्यक्षं न गता; तन्न जाने किं पद्भ्यां गता, उत प्रवहणेनेति।

(प्रविश्य सामर्षो वीरकः।)

पादप्पहार-परिभव-विमाणणा-बद्धगुरुअ-वेरस्स।
अणुसोअन्तस्स इमं कधं पि रत्ती पभादा मे॥ २३ ॥
(पाद-प्रहार-परिभव-विमानना-बद्ध-गुरुक-वैरस्य।
अनुशोचत इयं कथमपि रात्रिः प्रभाता मे॥ २३ ॥)

ता जाव अधिअरणमण्डवं उवसप्पामि। (प्रवेष्टकेन) सुहं अज्जमिस्साणं? (तद् यावदधिकरणमण्डपमुपसर्पामि।) (सुखम् आर्यमिश्राणाम्?)

अधिकरणिकः— अये ! नगररक्षाधिकृतो वीरकः। वीरक ! किमाग-


चारुदत्त— वास्तव में मेरे सामने नहीं गयी, अतः मैं यह नहीं जानता हूँ कि पैदल गयी अथवा गाड़ी से ?

अन्वयः— पादप्रहारपरिभवविमाननावद्धगुरुकवैरस्य, अनुशोचतः, मे, इयम्, रात्रिः, कथमपि, प्रभाता ॥२३॥

शब्दार्थ— पादप्रहारपरिभवविमाननावद्धगुरुकवैरस्य=पैर से मारने के अनादर से होने वाली अवज्ञा से जनित बहुत बड़ी शत्रुता वाले, अनुशोचतः=लगातार सोच करने वाले, मे=मेरी (वीरक की), इयम्=यह, रात्रिः=रात, कथमपि=किसी प्रकार, प्रभाता=सवेरा बन गयी ॥२३॥

अर्थ— (क्रोध के साथ प्रवेश करके)
वीरक— (चन्दनक के) पैर के मारने के अनादर से होने वाली अवज्ञा से जनित बहुत बड़ी शत्रुता वाले निरन्तर सोचने वाले मेरी (वीरक भी) यह रात (ही) किसी प्रकार सवेरा बन गयी ॥२३॥

टीका— चन्दनपादप्रहारापमानितो वीरको न्यायालये समागत्य स्वव्यथां प्रतिपादयति-पादेति। पादप्रहारेण=चरणाघातेन चन्दनकस्येति शेषः, यः परिभव = अनादरः, तेन या विमानना=अवज्ञा, तया बद्धम्=उत्पादितम् गुरुकम्=महत्, वैरम्=शत्रुत्वं यस्य तादृशस्य, अनुशोचतः=तद्विषयेऽनवरतं चिन्तयतः, मे=मम, वीरकस्येत्यर्थः, इयम्=तदैव व्यतीता, रात्रिः=निशा, प्रभाता=अतीता, सूर्योदयोऽभवदिति भावः। गाथा नाम वृत्तम् ॥२३॥

अर्थ— तो अब न्यायालय में जाता हूँ। (प्रवेश करके) विद्वानों! आप लोगों का कल्याण है।

अधिकरणिक— अरे ! नगर की रक्षा के लिये नियुक्त वीरक। वीरक !

नवमोऽङ्कः ५४३

मनप्रयोजनम् ?

वीरकः-- ही ही ! बन्धण-भेअण-सम्भमे अज्जकं अण्णेसन्तो ओवारिदं पवहणं वच्चदित्ति विआर करन्तो अण्णेसन्तो 'अरे ! तुए वि आलोइदे मए वि आलोइदव्वो' त्ति भणन्तो ज्जेव चन्दणमहत्तरेण पादेण ताडिदो म्हि । एदं सुणिअ अज्जमिस्सा पमाणं । ( ही ही ! बन्धनभेदनसम्भ्रमे आर्यकमन्वेषयन् अपवारितं प्रवहणं व्रजतीति विचारं कुर्वन् अन्वेषयन्--'अरे ! त्वयापि आलोकिते मयापि आलोकयितव्यम्' इति भणन्नेव, चन्दनमहत्तरेण पादेन ताडितोऽस्मि । एतन श्रुत्वा आर्यमिश्राः प्रमाणम् । )

अधिकरणिकः-- भद्र ! जानीषे कस्य तत् प्रवहणमिति ?

वीरकः-- इमस्स अज्जचारुदत्तस्स । वसन्तसेणा आरूढा, पुप्फकरण्डकजिण्णुज्जाणं कीलिदुं गोअदि त्ति पवहणवाहएण कहिदं । ( अस्य आर्यचारुदत्तस्य । वसन्तसेना आरूढा, पुष्पकरण्डकजीर्णोद्यानं क्रीडितुं नीयत इति प्रवहणवाहकेन कथितम् । )

शकारः-- पुणोवि शुद अज्जेहि ? ( पुनरपि श्रुतमार्यैः ? )

अधिकरणिकः--

एष भो ! निर्मलज्योत्स्नो राहुणा ग्रस्यते शशी । जलं कूलावपातेन प्रसन्नं कलुषायते ॥ २४ ॥


तुम्हारे आने का क्या प्रयोजन है ?

वीरक-- हथकड़ी बेड़ी तोड़ने से हुयी घबड़ाहट में आर्यक को खोजता हुआ 'ढकी हुई गाड़ी जा रही है', यह सोचकर उसकी जानकारी ( तलाशी ) लेते हुये 'अरे तुम्हारे ( चन्दनक के ) द्वारा देखी जाने पर मुझे भी देखना चाहिये' ऐसा कहते हुये ही मुझे सेनापति चन्दनक ने पैर से मारा है। यह सुनकर आप विद्वान ही प्रमाण हैं । ( उचित निर्णय करने वाले हैं ।)

अधिकरणिक-- श्रीमन् ! जानते हो कि वह गाड़ी किसकी थी ?

वीरक-- इसी आर्य चारुदत्त की । वसन्तसेना चढ़ी हुई थी, 'रमण के लिये पुष्पकरण्डकजीर्णोद्यान में ले जायी जा रही है' - ऐसा गाड़ीवान ने कहा था ।

शकार-- श्रीमन् आपलोगों ने फिर सुन लिया ?

अन्वयः-- भोः, निर्मलज्योत्स्नः, एषः, शशी, राहुणा, ग्रस्यते, कूलावपातेन, प्रसन्नम्, जलम्, कलुषायते ॥२४॥

शब्दार्थ-- भोः=कष्ट है, निर्मलज्योत्स्नः=निर्मल चाँदनीवाला, एषः=यह, शशी=चन्द्रमा, राहुणा=राहु के द्वारा, ग्रस्यते=निगला जा रहा है, कूलावपातेन=

५४४ मृच्छकटिकम्

वीरक ! पश्चादिह भवतो न्यायं द्रक्ष्यामः। एषोऽधिकरणद्वारि अश्व-स्तिष्ठति, तमेनमारुह्य गत्वा पुष्पकरण्डकोद्यानं दृश्यताम्-अस्ति तत्र काचिद्विपन्ना स्त्री न वेति ?

वीरकः- जं अज्जो आणवेदि । ( इति निष्क्रान्तः, प्रविश्य च ) गदो म्हि तर्हि, दिट्ठं च मए इत्थिआकलेवरं सावदेहिं विलुप्पन्तं । ( यदार्य आज्ञाप-यति । ) ( गतोऽस्मि तस्मिन्, दृष्टञ्च मया स्त्रीकलेवरं श्वापदैर्विलुप्यमानम् । )

श्रेष्ठिकायस्थौ- कथं तुए जाणिदं इत्थिआकलेवरं त्ति ? ( कथं त्वया ज्ञातं स्त्रीकलेवरमिति ? )

वीरकः- सावसेसेहिं केस-हस्त-पाणि-पादेहि उवलक्खिदं मए । ( सावशेषैः केश-हस्त-पाणि-पादैरुपलक्षितं मया । )

अधिकरणिकः- अहो ! धिक् वैषम्यं लोकव्यवहारस्य ।


तट के गिरने के कारण, प्रसन्नम्=निर्मल, जलम्=पानी, कलुषायते=मलिन हो रहा है ॥२४॥

अर्थ—अधिकरणिक—
दुख है, निर्मल चान्दनी वाला यह चन्द्रमा राहु द्वारा निगला जा रहा है। तट के गिरने के कारण निर्मल जल कलुषित ( मैला ) हो रहा है ॥२४॥

टीका- वीरकस्य वचनानि शकारकृतारोपस्य साधकानीति दुःखं प्रकटयति, अधिकरणिकः-एष इति । भोः=इदं दुःखसूचकमव्ययं तत्रस्थानामा मन्त्रणायेति बोध्यम्, निर्मला=शुभ्रा, ज्योत्स्ना=कौमुदी यस्य तादृशः एषः=पुरोवर्तमानः, शशी= चन्द्रः चारुदत्तरूप इत्यर्थः, राहुणा=सिंहिकापुत्रेण ग्रहविशेषेण, ग्रस्यते=कवलीक्रियते, प्रसन्नम्=निर्मलम्, जलम्=वारि, कूलस्य=तटस्य, अवपातेन=भङ्गेन, कलुषायते= मलिनाथते । अकलुषं कलुषं क्रियते इत्यर्थे साधु । पथ्यावक्त्रं वृत्तम् ॥२४॥

अर्थ- वीरक ! आपका न्याय बाद में देखेंगे, न्यायालय के दरवाजे पर जो घोड़ा खड़ा है उस पर चढ़ कर जाकर पुष्पकरण्डक उद्यान में देखिये -'क्या वहाँ कोई स्त्री मरी पड़ी है ।'

वीरक- श्रीमान् की जैसी आज्ञा । (ऐसा कह कर निकला और प्रवेश करके) वहाँ गया था, वहाँ जंगली जानवरों द्वारा खाया जाता हुआ स्त्री का शरीर देखा ।

श्रेष्ठी और कायस्थ- तुमने यह कैसे जाना कि वह स्त्री का शरीर है ?
वीरक- बचे हुये केश, हाथ और पैर से मैंने जाना (कि स्त्री का शरीर है) ।

नवमोऽङ्कः ५४५

यथा यथेदं निपुणं विचार्यते तथा तथा सङ्कटमेव दृश्यते ।
अहो ! सुसन्ना व्यवहारनीतयो मतिस्तु गोः पङ्कगतेव सीदति ॥२५॥

चारुदत्त --- ( स्वगतम् )

यथैव पुष्पं प्रथमे विकासे समेत्य पातुं मधुपाः पतन्ति ।
एवं मनुष्यस्य विपत्तिकाले छिद्रेष्वनर्था बहुलीभवन्ति ॥ २६ ॥


अन्वयः— इदम्, यथा, यथा, निपुणम्, विचार्यते, तथा, तथा, संकटम्, एव, दृश्यते, अहो ! व्यवहारनीतयः, सुसन्नाः, ( भवन्ति ), तु, मतिः, पङ्कगता, गौः, इव, सीदति ॥२५॥

शब्दार्थ— इदम्=यह मुकदमा, यथा यथा =जैसे जैसे, निपुणम् = गम्भीरता-पूर्वक, विचार्यते = विचारित किया जाता है, तथा तथा = वैसे, वैसे, संकटम् = संकट, परेशानी, एव = ही, दृश्यते = दिखाई देती है, अहो = आश्चर्य है, व्यवहारनीतयः = मुकदमें की प्रक्रिया या प्रमाण, सुसन्नाः = अच्छी तरह परिपुष्ट, भवन्ति = हो रही हैं, तु = लेकिन, मतिः = बुद्धि, पंकगता = कीचड़ में फँसी हुई, गौ = गाय, इव = के समान, सीदति = दुखी, परेशान हो रही है ॥२५॥

अर्थ—अधिकरणिक— ओह ! लोकव्यवहार की विषमता को धिक्कार है —
इस मुकदमा को जैसे जैसे सावधानी से विचारा जा रहा है वैसे वैसे परेशानी ही दिखाई दे रही है । ओह ! मुकदमा के प्रमाण परिपुष्ट हो रहे हैं किन्तु ( हमारी ) बुद्धि कीचड़ में फंसी हुई गाय के समान दुखी हो रही है ॥२५॥

टीका—अधिकरणिकः लोकव्यवहारस्य विषमत्वमेव विशदयन्नाह—यथेति । इदम् = व्यवहाररूपं वस्तु, यथा यथा = येन येन प्रकारेण, निपुणम् = गम्भीरं सम्यग् वा, विचार्यते = निर्णीयते, तथा तथा = तेन तेन प्रकारेण, संकटम् = सुदारुणम्, दृश्यते = लक्ष्यतेऽस्माभिरिति शेषः, यावत्-सूक्ष्मतयाऽस्मिन् चारुदत्तस्य निर्दोषतासाधनाय विचार्यते तावदेव विपरीतं परिणमतीति चारुदत्तस्य रक्षा न शक्यते कर्तुमिति तदभिप्रायः । अहो = इदं विषादे, व्यवहारस्य = व्यवहाराङ्गभूतविचारस्य, नीतयः = नियमपद्धतयः, सुसन्नाः = सुलग्नाः जायन्ते, तु = किन्तु, मतिः = मदीया बुद्धिः, पंकगता = कर्दमे निपतिता, गौः = सौरभेयी, इव = यथा, सीदति = अवसादं प्राप्नोति । अत्रोपमा-लंकारः, वंशस्थबिलं वृत्तम् ॥२५॥

अन्वयः— प्रथमे, विकासे, पुष्पम्, पातुम्, भ्रमराः, यथैव, समेत्य, पतन्ति, एवम्, मनुष्यस्य, विपत्तिकाले, छिद्रेषु, अनर्थाः, बहुलीभवन्ति ॥२६॥

शब्दार्थ— प्रथमे = पहले, विकासे = खिलने ( के समय ) में, पुष्पम् = फूल ( के रस ) को, पातुम् = पीने के लिये, भ्रमराः = भौंरे, यथैव = जिस प्रकार से, पतन्ति = गिरते हैं, टूट पड़ते हैं, एवम् = इसी प्रकार, मनुष्यस्य = मनुष्य के, विपत्तिकाले =

३५ मृ०

५४६ | मृच्छकटिकम्

अधिकरणिकः--आर्यचारुदत्त ! सत्यमभिधीयताम् ।

चारुदत्तः--

दुष्टात्मा परगुणमत्सरी मनुष्यो रागान्धः परमिह हन्तुकामबुद्धिः । किं यो वदति मृषैव जातिदोषात् तद् ग्राह्यं भवति न तद्विचारणीयम् ॥ २७ ॥


विपत्ति के समय में, छिद्रेषु=छिद्रों में, छोटे छोटे दोषों में भी, अनर्थाः=अनिष्ट, बहुलीभवन्ति=बहुत अधिक हो जाते हैं ॥२६॥

अर्थ चारुदत्त - ( अपने में ) -

पहले खिलने के समय में ही फूल ( के रस ) को पीने के लिये जिस प्रकार भौंरे टूट पड़ते हैं, उसी प्रकार मनुष्य की विपत्ति के समय छोटे छोटे दोषों में भी बड़े-बड़े अनिष्ट हो जाते हैं ॥२६॥

**टीका--**निर्धनतावशात् शकारकृतारोपे सत्येव वीरकस्य वचनानि अपि ममानिष्टकराण्येवेति प्रतिपादयन्नाह चारुदत्तः=यथैवेति । प्रथमे=आदौकालिके, विकासे=विकसनावसरे, पुष्पम्=पुष्परसमिति भावः, पातुम्=आस्वादयितुम्, भ्रमराः=अलयः, यथैव=येन प्रकारेण, पतन्ति=आक्राम्यन्ति, एवम्=तथैव, मनुष्यस्य=विपद्ग्रस्तस्य जनस्य, विपत्तिकाले=आपत्तिकाले, छिद्रेषु=तुच्छेष्वपि दोषेषु, अनर्थाः=अनिष्टानि, बहुलीभवन्ति=भृशीभवन्ति । तस्य लघुदोषेऽपि महती अनिष्टपरम्परा जायते इति तदभिप्रायः । अत्रोपमालंकारः, उपजातिः वृत्तम् ॥२६॥

अर्थ--अधिकरणिक-आर्य चारुदत्त ! सच सच बतलाइये ।

**अन्वयः--**इह, दुष्टात्मा, परगुणमत्सरी, रागान्धः, परम्, हन्तुकामबुद्धिः, यः, मनुष्यः, जातिदोषात्, मृषा, एव, यत्, वदति, किम्, तत्, ग्राह्यम्, भवति ? तत्, विचारणीयम्, न, [ भवति किम् ] ? ॥ २७ ॥

**शब्दार्थ--**इह=यहाँ [ न्यायालय में या समाज में ], दुष्टात्मा=दुष्ट प्रकृति-वाला, परगुणमत्सरी=दूसरे के गुणों के प्रति ईर्ष्या रखने वाला, रागान्धः=कामान्ध, परम्=दूसरे को, हन्तुकामबुद्धिः=मारने का विचार रखने वाला, यः=जो मनुष्यः=आदमी, जातिदोषात्=अपनी स्वाभाविक दुष्टता के कारण, मृषा=झूठ, एव=ही, यत्=जो, वदति=बोलता है, किम्=क्या, तत्=वह, ग्राह्यम्=स्वीकार करने योग्य, भवति=होता है ? तत्=वह, विचारणीयम्=विचार करने योग्य, न=नहीं [ भवति किम्=होता है क्या ] ? ॥ २७ ॥

अर्थ--चारुदत्त--

यहाँ दुष्टस्वभाव वाला, दूसरे के गुणों के प्रति ईर्ष्या रखने वाला, कामभाव

नवमोऽङ्कः १४७

अपि च--

योऽहं लतां कुसुमितामपि पुष्पहेतो- राकृष्य नैव कुसुमावचयं करोमि। सोऽहं कथं भ्रमरपक्षरुचौ सुदीर्घे केशे प्रगृह्य रुदतीं प्रमदां निहन्मि ? ॥ २८ ॥

से अन्धा ( विवेकशून्य ), दूसरे को मारने का विचार रखने वाला जो व्यक्ति अपनी स्वाभाविक दुष्टता के कारण झूठ ही बोलता है, क्या वह स्वीकार करने योग्य ही होता है ? वह विचार करने योग्य नहीं होता है ? ॥ २७ ॥

टीका—दुर्जनवचनानि प्रमाणीकृत्य कस्यापि अपराधित्वस्वीकरणमनुचितमिति प्रतिपादयति—इहेति। इह=अत्र, न्यायालये लोके वा, परगुणेषु=अन्यगुणेषु, मत्सरी=विद्वेषी, परगुणासहनशील इत्यर्थः, दुष्टात्मा=नीचप्रकृतिः, मनुष्यः=नरः, रागान्धः=कामिन्यादिविषयासक्त्या अन्धः=सदसद्विवेकशून्यः, सन्, परम्=अन्यम्, हन्तुकामबुद्धिः=हन्तुम्=नाशयितुम्, कामः=इच्छा यस्यास्तादृशी बुद्धिः=मतिः यस्य सः, जातिदोषात्=नीचप्रकृतिदोषात्, मृषा=असत्यम्, एव, यत्, वदति=कथयति, तत्=दुष्टवचनम्, ग्राह्यम्=स्वीकार्यम्, भवति किम् ? नैव स्वीकार्यमिति भावः, तत्=तादृशवचनम्, न=नैव, विचारणीयम्=विचारयोग्यम् ? अपि तु विचारणीयमेव। विचारं कृत्वैव तत्र निर्णयो विधेय इति तद्भावः। अत्राप्रस्तुतप्रशंसालंकारः, प्रहर्षिणी वृत्तम् ॥ २७ ॥

अन्वयः—यः, अहम्, कुसुमिताम्, लताम्, अपि, पुष्पहेतोः, आकृष्य, पुष्पावचयम्, न, करोमि, सः, अहम्, भ्रमरपक्षरुचौ, सुदीर्घे, केशे, प्रगृह्य, रुदतीम्, प्रमदाम्, कथम्, निहन्मि ॥ २८ ॥

शब्दार्थ—यः=जो, अहम्=मैं, चारुदत्त, कुसुमिताम्=फूली हुई, लताम्=लता को, अपि=भी, पुष्पहेतोः=फूल (तोड़ने) के लिये, आकृष्य=खींचकर, पुष्पावचयम्=फूलों का चयन, न=नहीं, करोमि=करता हूँ, सः=वह, [ इतना अधिक भावुक ], अहम्=मैं, चारुदत्त, भ्रमरपक्षरुचौ=भौरों के पंखों की कान्ति के समान कान्ति वाले, सुदीर्घे=बहुत लम्बे, केशे=बालों में ( बालों को ), प्रगृह्य=खींचकर, पकड़ कर, रुदतीम्=रोती हुई, प्रमदाम्=नवयुवती को, निहन्मि=बलपूर्वक मारता हूँ ? अर्थात् नहीं मार सकता हूँ ॥ २८ ॥

अर्थ—और भी

जो मैं फूली हुई लता को भी फूल [तोड़ने] के लिये खींचकर फूल नहीं तोड़ता हूँ वही मैं भौरों के पंखों के समान कान्ति वाले काले लम्बे लम्बे बालों को पकड़ कर रोती हुई नवयुवती को कैसे मार सकता हूँ ? अर्थात् नहीं मार सकता हूँ ॥ २८ ॥

५४८ | मृच्छकटिकम्

शकारः— हंहो अधिअलणभोइआ ! किं तुम्हे पक्खवादेण व्यवहालं पेक्खध, जेण अज्जवि एशे हदाशचालुदत्ते आशणे घालीअदि ? (हंहो अधिकरणभोजकाः ! किं यूयं पक्षपातेन व्यवहारं पश्यत, येन अद्यापि एष हताश-चारुदत्त आसने धार्यते ? )

अधिकरणिकः— भद्र शोधनक ! एवं क्रियताम् ।

(शोधनकस्तथा करोति ।)

चारुदत्तः— विचार्यतां भो अधिकृताः ! विचार्यताम् । ( इत्यासनादवतीर्य भूमावुपविशति ।)

शकारः— ( स्वगतम् । सहर्षं नर्त्तित्वा ) ही अणेण मए कड़े पावे अण्णइश


टीका— आत्मनो निर्दोषतां साधयितुमाह - य इति । यः=दयालुस्वभावः, अहम्=चारुदत्तः, कुसुमिताम्=सञ्जातपुष्पाम्, लताम्=व्रततिम्, अपि, पुष्पहेतोः=पुष्पग्रहणार्थम्, आकृष्य=आकृष्टां कृत्वा, पुष्पावचयम्=पुष्पाणां चयनम्, नैव=न, करोमि=विदधामि, सः=पूर्वोक्तदयालुस्वभावः, भ्रमरपक्षरुचौ=अलिपंखतुल्यनीले, सुदीर्घे=अतिविशाले, केशे=कुन्तले, अवच्छेदार्थे आश्लेषार्थे वा सप्तमी, प्रगृह्य=बलपूर्वकमाकृष्य, रुदतीम्=विलपन्तीम्, प्रमदाम्=नवयुवतिम्, कथम्=केन प्रकारेण, निहन्मि=घातयामि, न कथमपीति तद्भावः । अत्र काव्यलिङ्गमलंकारः, वसन्ततिलकं वृत्तम् ॥ २८ ॥

विमर्श— चारुदत्त अपनी अतिकोमल प्रकृति का वर्णन करते हुये सिद्ध करना चाहता है जो व्यक्ति लता तक को नहीं खींच सकता वह कोमलांगी नवयौवना वसन्तसेना को, बालों को खींचकर, मार डालेगा, यह सम्भावना ही नहीं करनी चाहिये ॥ २८ ॥

शब्दार्थ— पक्षपातेन=पक्षपात के साथ, धार्यते=बैठाया हुआ है, नर्तित्वा=नाच कर, निपातितम्=लगा दिया, सिद्ध कर दिया ।

अर्थ -- शकार— हे मान्यवर न्यायाधिकारियों ! क्या आप लोग पक्षपात करके मुक़दमा का विचार कर रहे है, जिससे अभी भी यह अधम चारुदत्त कुर्सी पर बैठाया गया है ?

अधिकरणिक— भद्र शोधनक ! ऐसा करो अर्थात् चारुदत्त को आसन से उतार दो ।

( शोधनक वैसा ही करता है, चारुदत्त को आसन से हटा देता है । )

चारुदत्त— न्यायाधिकारियो ! विचार करिये ।

( यह कह कर आसन से उतर कर जमीन पर बैठ जाता है । )

शकारः— (अपने में, हर्षपूर्वक नाच कर) हा, हा, मैंने अपना किया हुआ

नवमोऽङ्कः ५४९

मत्थके णिवडिदे ता जहिं चालुदत्ताके उवविशदि, तहिं हग्गे उवविशामि। (तथा कृत्वा) चालुदत्ता ! पेक्ख पेक्ख मं, ता भण भण मए मालिदे त्ति। (ही, अनेन मया कृतं पापमन्यस्य मस्तके निपातितम्। तद् यत्र चारुदत्त उपविशति, तस्मि-न्नहमुपविशामि।) (चारुदत्त ! प्रेक्षस्व, प्रेक्षस्व माम्, तद् भण भण मया मारितेति।)

चारुदत्तः—भो अधिकृताः !। ("दुष्टात्मा" इति ९।२७ पूर्वोक्तं पठति। सनिःश्वासं स्वगतम्)

मैत्रेय भोः ! किमिदमद्य ममोपघातो
हा ब्राह्मणि ! द्विजकुले विमले प्रसूता।
हा रोहसेन ! नहि पश्यसि मे विपत्तिं
मिथ्यैव नन्दसि परव्यसनेन नित्यम् ॥ २६ ॥

पाप दूसरे (चारुदत्त) के सिर पर लगा दिया। इस लिये जहाँ चारुदत्त बैठा था, वहाँ मैं बैठता हूँ। (वहाँ बैठ कर) चारुदत्त ! मुझे देखो, देखो, और कहो, कहो कि मैंने मार डाली।

अन्वयः--भो मैत्रेय !, इदम् किम् ? अद्य, मम, उपघातः, [समागतः], हा, ब्राह्मणि !, विमले, द्विजकुले, प्रसूता, [असि], हा रोहसेन ! मे, विपत्तिम्, न हि, पश्यसि, परव्यसनेन, नित्यम्, मिथ्या, एव, नन्दसि ॥२६॥

शब्दार्थ--भो मैत्रेय !=हे मित्र मैत्रेय !, इदम्=यह (सामने होने वाला), किम्=क्या है ? अद्य=आज, मम=मेरा, उपघातः=अनिष्टपात, विनाश, (समागतः=आ गया है।), हा=हाय, ब्राह्मणि=ब्राह्मणि ! (मेरी प्रिय पत्नि), विमले=निष्कलंभ, कुले=वंश में, प्रसूता=उत्पन्न हुई हो, हा रोहसेन !=हाय बेटा रोहसेन !, मे=मुझ चारुदत्त की, विपत्तिम्=प्राणदण्डरूप कष्ट को, न हि=नहीं, पश्यसि=देख रहे हो, परव्यसनेन=केवल बालक सुलभ खेलकूद से, नित्यम्=रोजाना, मिथ्या एव=झूठ ही, नन्दसि=खुश रहते हो ॥ २६ ॥

**अर्थ--चारुदत्त--**हे न्यायाधीशो ! ('दुष्टात्मा परगुणमत्सरी' इत्यादि पूर्वोक्त २७ वां श्लोक पढ़ता है। निःश्वासपूर्वक अपने आप में-)

हे मैत्रेय ! यह क्या ? आज मेरा विनाश (आ गया है)। हाय ब्राह्मणि ! तुम निष्कलंक ब्राह्मणकुल में पैदा हुई हो। (किन्तु तुम्हारा पति कलंकी होकर मारा जा रहा है।) हाय बेटा रोहसेन ! मेरी (मृत्युदण्डरूप) विपत्ति को नहीं देख रहे हो। रोजाना केवल खेलकूद से ही झूठ में आनन्दित होते हो। (तुम्हें आने वाले कष्ट का आभास नहीं है।) ॥२९॥

टीकाः--साम्प्रतं विपत्तिसागरे निमग्नश्चारुदत्तः स्वजनसम्बोधनपूर्वकं विलपन्नाह—मैत्रेयेति। भो मैत्रेय=मित्र मैत्रेय !, इदम्=समक्षमुपस्थितमकल्पितम्,

५५० मृच्छकटिकम्

प्रेषितश्च मया तद्वार्त्तान्वेषणाय मैत्रेयो वसन्तसेनासकाशं शकटिका-निमित्तञ्च तस्य प्रदत्तान्यलङ्करणानि प्रत्यर्पयितुम् । तत् कथं चिरयते ? ( ततः प्रविशति गृहीताभरणो विदूषकः । )

विदूषकः—पेसिदोम्हि अज्जचारुदत्तेण वसन्तसेणासआसं तहिं अलङ्करणाइं गेण्हिअ, जधा—'अज्जमित्तेअ ! वसन्तसेणाए वच्छो रोहसेणो अत्तणो अलङ्कारेण अलङ्करिअ जणणीसआसं पेसिदो; इमस्स आहरणं दादव्वं, ण उण गेण्हिदव्वं, ता समप्पेहि त्ति ! ता जाव वसन्तसेणासआसं ज्जेव गच्छामि । (परिक्रम्यावलोक्य च, आकाशे ) कधं भावरेभिलो ?


किम्=कथमागतम्, तदेव विवृणोति, अद्य=अस्मिन् दिवसे, मम=मे, सर्वथा निर्दोषस्येत्यर्थः, उपघातः=अनिष्टपातः मृत्युरूपः समागत इति शेषः, एवं मम पतनं भविष्यतीति तु मया पूर्वं न कदापि चिन्तितमासीत्, हा=इदं विषादसूचकमव्ययम्, ब्राह्मणि=इदं स्वपत्न्यः धूतायाः सम्बोधनम्, विमले=निष्कलंके, द्विजकुले=विप्रवंशे, प्रसूता=जाता असि, किन्तु तव पतिः साम्प्रतं कलंकीभूतः मृत्युमुखमुपगच्छतीति कष्टकरमिति भावः, हा=इदमपि विषादसूचकमव्ययम्, रोहसेन=प्रिय पुत्र रोहसेन !, मे=स्वपितुः चारुदत्तस्य, विपत्तिम्=प्राणदण्डरूपां विपदम्, न हि=नैव, पश्यसि=अवलोकयसि त्वं स्वपितुर्मरणविषये न किमपि जानासीति भावः, परव्यसनेन=केवलेन क्रीडनादिना, नित्यम्=प्रत्यहम्, मिथ्या एव=मुधा एव, नन्दसि=सुखमनुभवसि यदा त्वं निजपितुरपराधविषये तद्दण्डविषये च ज्ञास्यसि तदा परमदुःखदुःखसागरे पतिष्यसीति तद्भावः । एवञ्च मित्रं पत्नीं सुतं च सम्बोधयन् स्वव्यथां प्रकटयतीति बोध्यम् । वसन्ततिलकं वृत्तम् ॥२६॥

शब्दार्थ—तद्वार्त्तान्वेषणाय=उस वसन्तसेना का समाचार मालूम करने के लिये, शकटिकानिमित्तम्=गाड़ी बनवाने के लिये, प्रत्यर्पयितुम्=वापस करने के लिये, चिरयते=देर कर रहा है, गृहीताभरणः=गहने लिये हुये, जननीसकाशम्=माता धूता के पास, समुद्विग्नः=बहुत दुखी, लक्ष्यसे= दिखाई पड़ रहे हो, अधिकरणमण्डपे=न्यायालय में, शब्दायितः=बुलाया गया है, अल्पेन कार्येण=छोटा काम, साधारण बात, स्वस्ति=कल्याण, क्षेम=कुशल, उद्विग्न उद्विग्नः=बहुत अधिक परेशान ।

अर्थ—मैंने उसका समाचार जानने के लिये वसन्तसेना के पास मैत्रेय को भेजा है और गाड़ी बनवाने के लिये उसके द्वारा दिये गये गहनों को वापस करने के लिये [भेजा है] । तो वह क्यों देर कर रहा है ।

( इसके बाद गहने पकड़े हुए विदूषक का प्रवेश होता है । )

अर्थ—विदूषक—आर्य चारुदत्त के द्वारा मुझे आभूषणों को लेकर वहाँ वसन्तसेना के पास भेजा गया है [और यह कहा गया है]—'आर्य मैत्रेय ! वसन्तसेना द्वारा

नवमोऽङ्कः ५५१

भो भावरेभिल ! किं णिमित्तं तुमं उव्विग्गो उव्विग्गो विअ लक्खीअसि ? (आकर्ण्य) किं भणासि ? 'पिअवअस्सो चारुदत्तो अधिअरणमण्डवे सद्वाइदो त्ति ?।' ता णहु अप्पेण कज्जेण होदव्वं । (विचिन्त्य) ता पच्छा वसन्तसेणासआसं गमिस्सं । अधिअरणमण्डवं दाव गमिस्सं । (परिक्रम्यावलोक्य च) इदं अधिअरणमण्डवं, ता जाव पविसासि । (प्रविश्य) सुहं अधिअरणभोइआणं ? कहिं मम पिअवअस्सो ? (प्रेषितोऽस्मि आर्यचारुदत्तेन वसन्तसेनासकाशम्, तस्मिन्नलङ्करणानि गृहीत्वा, यथा—'आर्यमैत्रेय ! वसन्तसेनया वत्सो रोहसेन आत्मनोऽलङ्कारेणालंकृत्य जननीसकाशं प्रेषितः, अस्या आभरणं दातव्यम् न पुनर्गृहीतव्यम् तत् समर्पये'ति । तद्यावत् वसन्तसेनासकाशमेव गच्छामि ।) (कथं भावरेभिलः ? भो भाव रेभिल ! किं निमित्तं त्वमुद्विग्न उद्विग्न इव लक्ष्यसे ? किं भणसि ? प्रियवयस्यश्चारुदत्तः अधिकरणमण्डपे शब्दायित इति । तत् न खलु अल्पेन कार्येण भवितव्यम् । तत् पश्चात् वसन्तसेनासकाशं गमिष्यामि । अधिकरणमण्डपं तावत् गमिष्यामि । अयमधिकरणमण्डपः, तद्यावत् प्रविशामि ।) (सुखमधिकरणभोजकानाम् ? कस्मिन् मम प्रियवयस्यः ? )

अधिकरजिकः—नन्वेष तिष्ठति ।
विदूषकः—वअस्स ! सोत्थि दे ? (वयस्य ! स्वस्ति ते ? )
चारुदत्तः—भविष्यति ।
विदूषकः--अवि क्खेमं दे ? । (अपि क्षेमं ते ? )


वत्स रोहसेन को अपने गहनों से सजाकर उसको माता (धूता) के पास भेजा गया था, इस (वसन्तसेना) को गहने देने चाहिये न कि लेने चाहिये, अतः इसे वापस दे दो।' अतः अब वसन्तसेना के पास जाता हूँ। (चलकर और देखकर आकाश की ओर) क्या भाव रेभिल ? हे मित्र रेभिल ? किस कारण तुम बहुत परेशान से दिखाई दे रहे हो ? (सुनकर) क्या कह रहे ह — 'प्रिय मित्र आर्य चारुदत्त को न्यायालय में बुलाया गया है।' तो यहाँ निश्चित ही कोई बड़ा कारण होना चाहिए । (सोचकर) तो वसन्तसेना के पास बाद में जाऊँगा । पहले न्यायालय चलता हूँ। (घूमकर और देख कर) तो यह न्यायालय है। अतः इसमें प्रवेश करता हूँ। (प्रवेश करके) माननीय न्यायाधिकारियों का कल्याण हो। मेरे प्रिय मित्र चारुदत्त कहाँ है ?

अधिकरणिक—ये बैठे हुये हैं।
विदूषक—मित्र ! तुम्हारा कल्याण है ?
चारुदत्त—होगा ।
विदूषक—आप का कुशल तो है ?

५५२ | मृच्छकटिकम्

चारुदत्तःएतदपि भविष्यति ।

विदूषकः- भो वअस्स ! किं णिमित्तं उव्विग्गो उव्विग्गो विअ लक्खी-असि ? कुदो वा सहाइदो ? (भो वयस्य ! किं निमित्तमुद्विग्न उद्विग्न इव लक्ष्यसे ? कुतो वा शब्दायितः ? )

चारुदत्तःवयस्य !

मया खलु नृशंसेन परलोकमजानता ।
स्त्री रतिर्वाऽविशेषेण शेषमेषोऽभिधास्यति ॥ ३० ॥


चारुदत्त—यह भी होगा ।

विदूषक—हे मित्र ! किस कारण बहुत परेशान दिखाई दे रहे हो ? और यहाँ किस लिये बुलाये गये हो ?

अन्वयः—परलोकम्, अजानता, नृशंसेन, मया, खलु, स्त्री, वा, अविशेषेण, रतिः, शेषम्, एषः, अभिधास्यति ॥ ३० ॥

शब्दार्थ—परलोकम् = परलोक को, अजानता = न जानने वाले, नृशंसेन = क्रूर, मया = मुझ चारुदत्त के द्वारा, खलु = निश्चित, स्त्री = सामान्य औरत, वा = अथवा, अविशेषेण = अभेद से, साक्षात्, रतिः = कामदेव की पत्नी, शेषम् = आगे की और बात, अर्थात् मार डाली, एषः = यह, (शकार) अभिधास्यति = कहेगा ॥ ३० ॥

अर्थचारुदत्त—मित्र !

परलोक को न जानने वाले क्रूर मैंने एक स्त्री अथवा साक्षात् कामदेव की पत्नी रति—शेष बात [अर्थात् मार डाली]—यह [शकार] बतायेगा ॥ ३० ॥

टीकामैत्रेयकृत-प्रश्नस्योत्तरप्रदानाय यतमानश्चारुदत्तः स्वमुखादपराधं स्वीकर्तुमक्षमोऽत अंशत उत्तरं ददाति—परेति । परलोकम् = स्वर्गलोकम्, अजानता = अविदता, नृशंसेन = क्रूरेण, मया = चारुदत्तेन, खलु = निश्चितम्, स्त्री = सामान्या नारी, वा = अथवा, अविशेषेण = अभेदेन, रतिरिति भावः किं कृतेति जिज्ञासायामाह-शेषम् = अग्रे वक्तव्यम् घातितादि-पदमिति भावः, एषः = पुरो वर्तमानः शकारः, अभिधास्यति = कथयिष्यति । अत्र रूपकालंकारः, पथ्यावक्त्रं वृत्तम् ॥ ३० ॥

विमर्शःविदूषक जब चारुदत्त से न्यायालय में आने और दुखी होने का कारण पूछता है तो उस समय सिद्ध हो चुकने वाले अपने अपराध की चर्चा तो करता है। किन्तु वह यह नहीं कहता कि उसने वसन्तसेना का वध किया है। वह शकार द्वारा ही उक्त आरोप लगाया गया बताता है। किन्तु स्पष्टतया कह भी नहीं सकता क्योंकि अब तक की सारी कार्यवाही चारुदत्त को ही दोषी सिद्ध करती है ॥ ३० ॥

शब्दार्थ—संज्ञया = इशारे से, तपस्वी = बेचारा, हेतुभूतः = कारण बना है,

नवमोऽङ्कः ५५३

विदूषकः—किं किं ? ( किं किम् ? )
चारुदत्तः—( कर्णे ) एवमेवम् ।
विदूषकः—को एवं भणादि ? ( क एवं भणति ? )
चारुदत्तः—( संज्ञया शकारं दर्शयति ) नन्वेष तपस्वी हेतुभूतः, कृतान्तो मां व्याहरति ।
विदूषकः—(जनान्तिकम् ) एवं कीस ण भणीअदि गेहं गदे ति ? ( एवं किमर्थं न भण्यते गेहं गतेति ? )
चारुदत्तः—उच्यमानमप्यवस्थादोषान्न गृह्यते ।
विदूषकः—भो भो अज्ज ! जेण दाव पुरट्ठावणविहारारामदेउल-तडागकूव-जूवेहि अलङ्किदा णअरो उज्जइणी, सो अणीसो अत्थकल्लवत्त-कारणादो एरिसं अकज्जं अणुचिट्ठ ति ? (सक्रोधम्) अरे रे काणेली-सुदा ! राअस्साल-सण्ठाणआ ! उस्सुङ्खलआ ! किद-जण-दोसभण्डआ ! बहुसुवण्णमण्डिद-मक्कडआ ! भण भण मम अग्गदो, जो दाणि मम पिअवअस्सो कुसुमिदं माधवोलदं वि आकिट्टिअ कुसुमावचअं ण करेदि, कदावि आकिट्टिदाए पल्लवच्छेदो भोदित्ति, सो कहं एरिसं अकज्जं उहअलोअविरुद्धं करेदि ? चिट्ठ रे कुट्टणिपुत्ता ! चिट्ठ, जाव एदिणा


कृतान्तः=यमराज, व्याहरति=बुलाता है। अवस्थादोषात्=गरीबी रूप दोष के कारण, गृह्यते=मानी जाती है, अनीशः=निर्धन, अर्थकल्पवर्तकारणात्=धनरूपी तुच्छ कलेवा के कारण, कृतजनदोषभाण्ड=दूसरे पर अपने दोष को मढ़ने वाले, हृदयकुटिलेन=हृदय के समान टेढ़े, काकपदशीर्षमस्तकः=कौवा के पैर के समान शिरवाला, प्रतीपम्=उल्टा, कक्षदेशात्=काँख से, ससाध्वसम्=घबड़ाकर,

अर्थविदूषक —क्या क्या ?
चारुदत्त—(कान में) ऐसे ऐसे ।
विदूषक—कौन ऐसा कहता है ?
चारुदत्त -- (इशारे से शकार को दिखाता है) यह बेचारा तो कारण बना है वास्तव में यमराज ही मुझे बुला रहा है ।
विदूषक-(जनान्तिक) ऐसा क्यों नहीं कह देते—'वह घर गयी है।'
चारुदत्त—कहा जाता हुआ भी गरीबी दोष के कारण नहीं माना जाता है ।
विदूषक—हे सम्मानीय लोगों ! जिसके द्वारा ( नये ) नगर बनाने, विहार, बगीचे, बाग, मन्दिर, तालाब, कुओं तथा यज्ञीय स्तम्भों [ के निर्माण ] से यह उज्जयिनी नगरी अलंकृत की गयी है, वही निर्धन हो कर धनरूपी तुच्छ कलेवा के लिये ऐसा अनुचित कार्य करेगा ? (क्रोध के साथ) अरे रे ! कुलटा के बच्चे ! राजा

५५४ | मृच्छकटिकम्

तव हिअअकुडिलेण दण्डकट्टेण मत्थअं दे सदखण्डं करेमि । ( भो भो आर्याः ! येन तावत् पुरस्थापन-विहाराराम-देवकुल-तड़ागकूपयूपैरलङ्कृता नगरी उज्जयिनी, सोऽनीशोऽर्थकल्यवर्त्तकारणादीदृशमकार्यमनुतिष्ठतीति ? अरे रे काणेली-सुत ! राजश्यालसंस्थानक ! उच्छृङ्खलक ! कृतजनदोषभाण्ड ! बहुसुवर्णमण्डित मर्कटक ! भण भण समाग्रतः, य इदानीं मम प्रियवयस्यः कुसुमितां माधवीलतामप्याकृष्य कुसुमावचयं न करोति आकृष्टतया पल्लवच्छेदो भवतीति, सः कथमीदृशमकार्यमुभयलोकविरुद्धं करोति ? तिष्ठ रे कुट्टनीपुत्र ! तिष्ठ यावदेतेन तव हृदयकुटिलेन दण्डकाष्ठेन मस्तकं ते शतखण्डं करोमि । )

शकारः-- ( सक्रोधम् ) सुणन्तु सुगन्तु अज्जमिश्रा ! चालुदत्ताकेण शह मम विवादे ववहाले वा, ता कीश एशं काकपदशीशमत्थका मम शिले शदखण्ड कलेदि ? मा दाव ले दाशीए पुत्ता ! दुट्टवडुका ! : ( शृण्वन्तु शृण्वन्तु आर्यमिश्राः ! चारुदत्तेन सह मम विवादो व्यवहारो वा, तत् केन एष काकपदशीर्षमस्तको मम शिरः शतखण्डं करोति ? मा तावत् रे दास्याः पुत्र ! दुष्टवटुक ! )

( विदूषको दण्डकाष्ठमुद्यम्य पूर्वोक्तं पठति । शकारः सक्रोधमुत्थाय ताडयति । विदूषकः प्रतीपं ताडयति । अन्योन्यं ताडयतः । विदूषकस्य कक्षदेशादाभरणानि पतन्ति । )

शकारः-- ( तानि गृहीत्वा दृष्ट्वा ससाध्वसम् ) पेक्खन्तु पेक्खन्तु अज्जा ! एदे खलु ताए तवशिणीएकेलका अलङ्कारा । ( चारुदत्तमुद्दिश्य ) इमश्श


के शाले संस्थानक ! उच्छृङ्खल ! अपने दोष दूसरे पर मढ़नेवाले ! बहुत सोने से सजे हुये बन्दर ! बोल, मेरे सामने बोल । जो मेरा प्रिय मित्र फूली हुई लता को भी खींचकर फूल नहीं तोड़ता है क्योंकि खींचने से पल्लव टूट सकते हैं, वह इस समय कैसे दोनों लोकों से विरुद्ध ऐसा अनुचित कार्य करेगा ! ठहर जा, कुट्टिनी के बच्चे ! जब तक तुम्हारे हृदय के समान कुटिल [टेढे] इस लकड़ी के डण्डे से तुम्हारे मस्तक के सौ टुकड़े करता हूँ ।

शकार— (क्रोध के साथ) सम्मानीय महानुभावों ! सुनिये-सुनिये । चारुदत्त के साथ मेरा मुकदमा या विवाद है तो फिर कौवा के पैर के समान शिरवाला यहमेरे शिर के सौ टुकड़े क्यों करेगा ! अरे दासी के बच्चे ! दुष्ट ब्राह्मण ऐसा मत कर ।

( विदूषक दण्डे की लकड़ी उठाकर पूर्वोक्त को पढ़ता है । शकार भी क्रोध से उठकर पीटता है । विदूषक उल्टा मारता है । एक दूसरे को मारते हैं । विदूषक की काँख से गहने गिर जाते हैं । )

शकार-- ( उन्हें लेकर देखकर घबड़ाहट के साथ ) महानुभावों ! देखिये,

नवमोऽङ्कः ५५५


अत्थकल्लवत्तश्श कालणादो एशा मालिदा वावादिता अ । (प्रेक्षन्तां प्रेक्षन्ता- मार्याः ! एते खलु तस्यास्तपस्विन्या अलंकाराः ।) (अस्य अर्थकल्यवर्त्तस्य कारणा- देषा मारिता व्यापादिता च ।)

(अधिकृताः सर्वेऽधोमुखाः स्थिताः ।)

चारुदत्तः-- (जनान्तिकम् )

अयमेवंविधे काले दृष्टो भूषणविस्तरः ।
अस्माकं भाग्यवैषम्यात् पतितः पातयिष्यति ॥ ३१ ॥

विदूषकः--भो ! कीस भदत्थं ण णिवेदीअदि ? (भोः ! किमर्थं भूतार्थो न निवेद्यते ? )

चारुदत्तः--वयस्य !

दुर्बलं नृपतेश्चक्षुर्नैतत् तत्त्वं निरीक्षते ।
केवलं वदतो दैन्यमश्लाघ्यं मरणं भवेत् ॥ ३२ ॥


देखिये—ये ही उस बेचारी (वसन्तसेना) के गहने हैं । (चारुदत्त को लक्षित करके) इसी धनरूपी तुच्छ कलेवा के कारण वह मारी गयी, मारी गयी ।

(सभी न्यायाधिकारी मुख नीचा करके बैठ जाते हैं ।)

अन्वयः—एवम्विधे, काले, अस्माकम्, भाग्यवैषम्यात्, पतितः, दृष्टः, अयम्, भूषणविस्तरः पातयिष्यति ॥ ३१ ॥

शब्दार्थः--एवम्विधे=इस प्रकार के, काले=समय में, अस्माकम्=हमलोगों के, भाग्यवैषम्यात्=भाग्य के विपरीत होने से, पतितः=गिरा हुआ, दृष्टः= [ सभी के द्वारा ] देखा गया, अयम्=यह, भूषणविस्तरः=गहनों का समूह, पातयिष्यति=[ हम लोगों को ] गिरा देखा ॥ ३१ ॥

अर्थ-चारुदत्त-(जनान्तिक) ऐसे समय में हमलोगों के भाग्य के विपरीत होने से [तुम्हारी काँख से ] गिरा हुआ [सभी के द्वारा] देखा गया यह गहनों का समूह [हमलोगों को] गिरादेगा ॥३१॥

टीका—विदूषकस्य कक्षात्पतितमाभूषणसमूहं दृष्ट्वा चारुदत्तः स्वविनाशस्या- पशकुनं चिन्तयन् खेदं व्यनक्ति-अयमिति । एवम्विधे=ईदृशे, काले=समये, अस्माकं भाग्यवैषम्यात्=दौर्भाग्यात, पतितः=विदूषकस्य कक्षदेशात् भूमौ निपतितः, अतएव, दृष्टः=विलोकितः, सर्वैरिति शेषः, अयम्=पुरो दृश्यमानः, भूषणविस्तरः=अलङ्कार- समूहः, पातयिष्यति=विनाशयिष्यति मामित्यर्थः । एवञ्च निरपराधस्यापि मे विनाशाय इमानि भूषणानि हेतुत्वमुपगतानीति तद्भावः, पथ्यावक्त्रं वृत्तम् ॥ ३१ ॥

**अर्थ-विदूषक-**अरे ! बीती बात क्यों नहीं कह देते ?

अन्वयः--नृपतेः, चक्षुः, दुर्बलम्, एतत्, तत्त्वम्, न, निरीक्षते, (अतः), केवलम्, दैन्यम्, वदतः, [ मम ], अश्लाघ्यम्, मरणम्, भवेत् ॥ ३२ ॥