मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५३८ मृच्छकटिकम्
अधिकरणिकः-- (जनान्तिकम्)
तुलनञ्चाद्रिराजस्य समुद्रस्य च तारणम् । ग्रहणञ्चानिलस्येव चारुदत्तस्य दूषणम् ॥ २० ॥
जलैः, चाषस्य=स्वर्णवातकस्य अग्रपक्षः=पक्षाग्रम्, तस्य, सदृशम्=तुल्यम्, यथा स्यात् तथा, भृशम्=अत्यधिकम्, न=नैव, अभ्युक्षितः=सिक्तः असि, तथापि=पूर्वोक्तस्थितौ सत्यामपि, भवतः = शकारस्य, इदमाननम्, हेमन्तपद्ममिव = हेमन्ताख्यर्तुसम्भवं कमलमिव, निष्प्रभताम्=मलिनताम्, उपैति=गच्छति । अतः, एतत्=शकारोक्त-मभियोगादिकं सर्वम्, मिथ्या=असत्यमिति तद्भावः । वसन्ततिलकं वृत्तम् ॥ १६ ॥
विमर्शः-इस श्लोक का अभिप्राय कुछ अस्पष्ट है। घबड़ाहट के कारण शकार के माथे पर पसीने की बूंदें निकल आयीं हैं और चेहरा मुरझा गया है। अतः उसका कथन असत्य प्रतीत होता है। क्योंकि बिना वर्षा के माथे पर बूंदें होना अस्वाभाविक है। इसी लिये चारुदत्त कहता है कि स्वर्ण चातक के समान तुम आकाश में नहीं उड़ रहे थे जिससे चेहरे पर पानी की बूंदें दिखाई पड़तीं। अतः अकारण पसीना आना और मुख का मुरझा जाना ही तुम्हारे कथन की असत्यता बता रहे हैं।
कहीं कहीं 'तथापि' के स्थान पर 'तथाहि' ऐसा पाठ है। उनके अनुसार ऐसा अन्वय करना चाहिये—एतत् मिथ्या अस्ति, तथाहि-वलाहकानाम्, सलिलैः, न, अभ्युक्षितः, असि, अन्तराले, चाषाग्रपक्षसदृशम्, भवतः, इदम्, आननम्, हेमन्त-पद्मम्, इव, निष्प्रभताम्, उपैति ॥ १९ ॥
अन्वयः-- अद्रिराजस्य, तुलनम्, समुद्रस्य, तारणम्, अनिलस्य, च, ग्रहणम्, इव, चारुदत्तस्य, दूषणम् ॥ २० ॥
शब्दार्थ-- अद्रिराजस्य=हिमालय को, तुलनम्=तोलना, समुद्रस्य=समुद्र को, तारणम्=तैरना, च=और, अनिलस्य=वायु को, ग्रहणम्=पकड़ना, इव=के समान, चारुदत्तस्य=चारुदत्त को, दूषणम्=दूषित करना है ॥ २० ॥
अर्थ--अधिकरणिक -- (जनान्तिक) हिमालय को तौलने, समुद्र को तैरकर पार करने और हवा को पकड़ने के समान चारुदत्त को दोषी बनाना है। [अर्थात् जैसे ये तीनों असम्भव हैं वैसे ही चारुदत्त का अपराधी होना भी असम्भव है ] ॥ २० ॥
टीका-- चारुदत्तस्य दोषित्वमसम्भवमिदं प्रतिपादयति—तुलनमिति । अद्रि-राजस्य=हिमालयस्य, तुलनम्=तुलया गुरुत्वनिरूपणमिति भावः, समुद्रस्य=सागरस्य, तारणम्=सन्तरणेन अपरपारगमनम्, तथा, अनिलस्य=वायोः, ग्रहणम्=हस्तादिना संयमनम्, इव=तुल्यम्, चारुदत्तस्य, दूषणम्=दोषारोपणम् । एवञ्च यथैतत् त्रितयं