मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनवमोऽङ्कः ५३९
( प्रकाशम् ) आर्यचारुदत्तः खल्वसौ कथमिदमकार्यं करिष्यति ।
( घोणेत्यादि ३।१६ श्लोकं पठति । )
शकारः--किं पक्खवादेण व्यवहाले दीशदि ? ( किं पक्षपातेन व्यवहारो दृश्यते ? )
अधिकरणिकः--अपेहि मूर्ख ! ।
वेदार्थान् प्राकृतस्त्वं वदसि न च ते जिह्वा निपतिता
मध्याह्ने वीक्षसेऽर्कं न तव सहसा दृष्टिर्विंचलिता ।
दीप्ताग्नौ पाणिमन्तः क्षिपसि स च ते दग्धो भवति नो
चारित्र्याच्चारुदत्तं चलयसि न ते देहं हरति भूः ॥२१॥
लोकेऽसम्भवं तथैव चारुदत्तस्योपरि हत्यारोपणमपि असम्भवमेवेति तद्भावः । अत्र मालोपमालंकारः । पथ्यावक्त्रं वृत्तम् ॥२०॥
विमर्श--जैसे कोई हिमालय को नहीं तौल सकता, तैर कर समुद्र नहीं पार कर सकता, हाथ से हवा नहीं पकड़ सकता उसी प्रकार चारुदत्त पर दोष नहीं लगाया जा सकता। अतः शकारकृत आरोप झूठा है ॥२०॥
अर्थ--( प्रकट रूप में ) ये आर्यचारुदत्त इस अनुचित काम को कैसे कर सकते हैं। ( "ऊँची नाक वाला, अपाङ्ग तक विशाल नेत्र वाला" आदि पूर्वोक्त ३।१६ वाँ श्लोक पढ़ता है ।)
शकार--क्या पक्षपातपूर्ण ढंग से मुकदमा विचारा जा रहा है ?
अन्वयः--त्वम्, प्राकृतः, [सन्] वेदार्थान्, वदसि, ते, जिह्वा, न च, निपतिता, मध्याह्ने, अर्कम्, वीक्षसे, तव, दृष्टिः, सहसा, न, विचलिता, दीप्ताग्नौ, अन्तः, पाणिम्, क्षिपसि, ते, स, च, दग्धः, नो, भवति, चारुदत्तम्, चारित्र्यात्, चलयसि, भूः, ते, देहम्, न, हरति ॥२१॥
शब्दार्थ--त्वम्=तू शकार, प्राकृतः=नीच, सन्=होता हुआ, वेदार्थान्=वेदप्रतिपादित अर्थों को, वदसि=कह रहे हो, ते=तुम्हारी, जिह्वा=जीभ, न च=नहीं, निपतिता=गिरी, मध्याह्ने=दोपहर में, अर्कम्=सूर्य को, वीक्षसे=देख रहे हो, तव=तुम्हारा, दृष्टिः=आँख, सहसा=अचानक, न=नहीं, विचलिता=चौंधिया गई है, दीप्ताग्नेः=जलती आग के, अन्तः=बीच में, पाणिम्=हाथ, क्षिपसि=डाल रहे हो, ते=तुम्हारा, स च=वह, हाथ, दग्धः=जला हुआ, नो=नहीं, भवति=होता है, चारुदत्तम्=चारुदत्त को, चारित्र्यात्=सदाचार से, चलयसि=गिराते हो, भूः=पृथ्वी, ते=तुम्हारी, देहम्=शरीर को, न=नहीं, हरति=हर रही है ॥२१॥
अर्थ--अधिकरणिक--दूर हट जा मूर्ख !