मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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चारुदत्तः—एतदपि भविष्यति ।
विदूषकः- भो वअस्स ! किं णिमित्तं उव्विग्गो उव्विग्गो विअ लक्खी-असि ? कुदो वा सहाइदो ? (भो वयस्य ! किं निमित्तमुद्विग्न उद्विग्न इव लक्ष्यसे ? कुतो वा शब्दायितः ? )
चारुदत्तः—वयस्य !
मया खलु नृशंसेन परलोकमजानता ।
स्त्री रतिर्वाऽविशेषेण शेषमेषोऽभिधास्यति ॥ ३० ॥
चारुदत्त—यह भी होगा ।
विदूषक—हे मित्र ! किस कारण बहुत परेशान दिखाई दे रहे हो ? और यहाँ किस लिये बुलाये गये हो ?
अन्वयः—परलोकम्, अजानता, नृशंसेन, मया, खलु, स्त्री, वा, अविशेषेण, रतिः, शेषम्, एषः, अभिधास्यति ॥ ३० ॥
शब्दार्थ—परलोकम् = परलोक को, अजानता = न जानने वाले, नृशंसेन = क्रूर, मया = मुझ चारुदत्त के द्वारा, खलु = निश्चित, स्त्री = सामान्य औरत, वा = अथवा, अविशेषेण = अभेद से, साक्षात्, रतिः = कामदेव की पत्नी, शेषम् = आगे की और बात, अर्थात् मार डाली, एषः = यह, (शकार) अभिधास्यति = कहेगा ॥ ३० ॥
अर्थ—चारुदत्त—मित्र !
परलोक को न जानने वाले क्रूर मैंने एक स्त्री अथवा साक्षात् कामदेव की पत्नी रति—शेष बात [अर्थात् मार डाली]—यह [शकार] बतायेगा ॥ ३० ॥
टीका—मैत्रेयकृत-प्रश्नस्योत्तरप्रदानाय यतमानश्चारुदत्तः स्वमुखादपराधं स्वीकर्तुमक्षमोऽत अंशत उत्तरं ददाति—परेति । परलोकम् = स्वर्गलोकम्, अजानता = अविदता, नृशंसेन = क्रूरेण, मया = चारुदत्तेन, खलु = निश्चितम्, स्त्री = सामान्या नारी, वा = अथवा, अविशेषेण = अभेदेन, रतिरिति भावः किं कृतेति जिज्ञासायामाह-शेषम् = अग्रे वक्तव्यम् घातितादि-पदमिति भावः, एषः = पुरो वर्तमानः शकारः, अभिधास्यति = कथयिष्यति । अत्र रूपकालंकारः, पथ्यावक्त्रं वृत्तम् ॥ ३० ॥
विमर्शः—विदूषक जब चारुदत्त से न्यायालय में आने और दुखी होने का कारण पूछता है तो उस समय सिद्ध हो चुकने वाले अपने अपराध की चर्चा तो करता है। किन्तु वह यह नहीं कहता कि उसने वसन्तसेना का वध किया है। वह शकार द्वारा ही उक्त आरोप लगाया गया बताता है। किन्तु स्पष्टतया कह भी नहीं सकता क्योंकि अब तक की सारी कार्यवाही चारुदत्त को ही दोषी सिद्ध करती है ॥ ३० ॥
शब्दार्थ—संज्ञया = इशारे से, तपस्वी = बेचारा, हेतुभूतः = कारण बना है,