मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनवमोऽङ्कः ५५३
विदूषकः—किं किं ? ( किं किम् ? )
चारुदत्तः—( कर्णे ) एवमेवम् ।
विदूषकः—को एवं भणादि ? ( क एवं भणति ? )
चारुदत्तः—( संज्ञया शकारं दर्शयति ) नन्वेष तपस्वी हेतुभूतः, कृतान्तो मां व्याहरति ।
विदूषकः—(जनान्तिकम् ) एवं कीस ण भणीअदि गेहं गदे ति ? ( एवं किमर्थं न भण्यते गेहं गतेति ? )
चारुदत्तः—उच्यमानमप्यवस्थादोषान्न गृह्यते ।
विदूषकः—भो भो अज्ज ! जेण दाव पुरट्ठावणविहारारामदेउल-तडागकूव-जूवेहि अलङ्किदा णअरो उज्जइणी, सो अणीसो अत्थकल्लवत्त-कारणादो एरिसं अकज्जं अणुचिट्ठ ति ? (सक्रोधम्) अरे रे काणेली-सुदा ! राअस्साल-सण्ठाणआ ! उस्सुङ्खलआ ! किद-जण-दोसभण्डआ ! बहुसुवण्णमण्डिद-मक्कडआ ! भण भण मम अग्गदो, जो दाणि मम पिअवअस्सो कुसुमिदं माधवोलदं वि आकिट्टिअ कुसुमावचअं ण करेदि, कदावि आकिट्टिदाए पल्लवच्छेदो भोदित्ति, सो कहं एरिसं अकज्जं उहअलोअविरुद्धं करेदि ? चिट्ठ रे कुट्टणिपुत्ता ! चिट्ठ, जाव एदिणा
कृतान्तः=यमराज, व्याहरति=बुलाता है। अवस्थादोषात्=गरीबी रूप दोष के कारण, गृह्यते=मानी जाती है, अनीशः=निर्धन, अर्थकल्पवर्तकारणात्=धनरूपी तुच्छ कलेवा के कारण, कृतजनदोषभाण्ड=दूसरे पर अपने दोष को मढ़ने वाले, हृदयकुटिलेन=हृदय के समान टेढ़े, काकपदशीर्षमस्तकः=कौवा के पैर के समान शिरवाला, प्रतीपम्=उल्टा, कक्षदेशात्=काँख से, ससाध्वसम्=घबड़ाकर,
अर्थ—विदूषक —क्या क्या ?
चारुदत्त—(कान में) ऐसे ऐसे ।
विदूषक—कौन ऐसा कहता है ?
चारुदत्त -- (इशारे से शकार को दिखाता है) यह बेचारा तो कारण बना है वास्तव में यमराज ही मुझे बुला रहा है ।
विदूषक-(जनान्तिक) ऐसा क्यों नहीं कह देते—'वह घर गयी है।'
चारुदत्त—कहा जाता हुआ भी गरीबी दोष के कारण नहीं माना जाता है ।
विदूषक—हे सम्मानीय लोगों ! जिसके द्वारा ( नये ) नगर बनाने, विहार, बगीचे, बाग, मन्दिर, तालाब, कुओं तथा यज्ञीय स्तम्भों [ के निर्माण ] से यह उज्जयिनी नगरी अलंकृत की गयी है, वही निर्धन हो कर धनरूपी तुच्छ कलेवा के लिये ऐसा अनुचित कार्य करेगा ? (क्रोध के साथ) अरे रे ! कुलटा के बच्चे ! राजा