मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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तव हिअअकुडिलेण दण्डकट्टेण मत्थअं दे सदखण्डं करेमि । ( भो भो आर्याः ! येन तावत् पुरस्थापन-विहाराराम-देवकुल-तड़ागकूपयूपैरलङ्कृता नगरी उज्जयिनी, सोऽनीशोऽर्थकल्यवर्त्तकारणादीदृशमकार्यमनुतिष्ठतीति ? अरे रे काणेली-सुत ! राजश्यालसंस्थानक ! उच्छृङ्खलक ! कृतजनदोषभाण्ड ! बहुसुवर्णमण्डित मर्कटक ! भण भण समाग्रतः, य इदानीं मम प्रियवयस्यः कुसुमितां माधवीलतामप्याकृष्य कुसुमावचयं न करोति आकृष्टतया पल्लवच्छेदो भवतीति, सः कथमीदृशमकार्यमुभयलोकविरुद्धं करोति ? तिष्ठ रे कुट्टनीपुत्र ! तिष्ठ यावदेतेन तव हृदयकुटिलेन दण्डकाष्ठेन मस्तकं ते शतखण्डं करोमि । )
शकारः-- ( सक्रोधम् ) सुणन्तु सुगन्तु अज्जमिश्रा ! चालुदत्ताकेण शह मम विवादे ववहाले वा, ता कीश एशं काकपदशीशमत्थका मम शिले शदखण्ड कलेदि ? मा दाव ले दाशीए पुत्ता ! दुट्टवडुका ! : ( शृण्वन्तु शृण्वन्तु आर्यमिश्राः ! चारुदत्तेन सह मम विवादो व्यवहारो वा, तत् केन एष काकपदशीर्षमस्तको मम शिरः शतखण्डं करोति ? मा तावत् रे दास्याः पुत्र ! दुष्टवटुक ! )
( विदूषको दण्डकाष्ठमुद्यम्य पूर्वोक्तं पठति । शकारः सक्रोधमुत्थाय ताडयति । विदूषकः प्रतीपं ताडयति । अन्योन्यं ताडयतः । विदूषकस्य कक्षदेशादाभरणानि पतन्ति । )
शकारः-- ( तानि गृहीत्वा दृष्ट्वा ससाध्वसम् ) पेक्खन्तु पेक्खन्तु अज्जा ! एदे खलु ताए तवशिणीएकेलका अलङ्कारा । ( चारुदत्तमुद्दिश्य ) इमश्श
के शाले संस्थानक ! उच्छृङ्खल ! अपने दोष दूसरे पर मढ़नेवाले ! बहुत सोने से सजे हुये बन्दर ! बोल, मेरे सामने बोल । जो मेरा प्रिय मित्र फूली हुई लता को भी खींचकर फूल नहीं तोड़ता है क्योंकि खींचने से पल्लव टूट सकते हैं, वह इस समय कैसे दोनों लोकों से विरुद्ध ऐसा अनुचित कार्य करेगा ! ठहर जा, कुट्टिनी के बच्चे ! जब तक तुम्हारे हृदय के समान कुटिल [टेढे] इस लकड़ी के डण्डे से तुम्हारे मस्तक के सौ टुकड़े करता हूँ ।
शकार— (क्रोध के साथ) सम्मानीय महानुभावों ! सुनिये-सुनिये । चारुदत्त के साथ मेरा मुकदमा या विवाद है तो फिर कौवा के पैर के समान शिरवाला यहमेरे शिर के सौ टुकड़े क्यों करेगा ! अरे दासी के बच्चे ! दुष्ट ब्राह्मण ऐसा मत कर ।
( विदूषक दण्डे की लकड़ी उठाकर पूर्वोक्त को पढ़ता है । शकार भी क्रोध से उठकर पीटता है । विदूषक उल्टा मारता है । एक दूसरे को मारते हैं । विदूषक की काँख से गहने गिर जाते हैं । )
शकार-- ( उन्हें लेकर देखकर घबड़ाहट के साथ ) महानुभावों ! देखिये,