मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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वीरक ! पश्चादिह भवतो न्यायं द्रक्ष्यामः। एषोऽधिकरणद्वारि अश्व-स्तिष्ठति, तमेनमारुह्य गत्वा पुष्पकरण्डकोद्यानं दृश्यताम्-अस्ति तत्र काचिद्विपन्ना स्त्री न वेति ?
वीरकः- जं अज्जो आणवेदि । ( इति निष्क्रान्तः, प्रविश्य च ) गदो म्हि तर्हि, दिट्ठं च मए इत्थिआकलेवरं सावदेहिं विलुप्पन्तं । ( यदार्य आज्ञाप-यति । ) ( गतोऽस्मि तस्मिन्, दृष्टञ्च मया स्त्रीकलेवरं श्वापदैर्विलुप्यमानम् । )
श्रेष्ठिकायस्थौ- कथं तुए जाणिदं इत्थिआकलेवरं त्ति ? ( कथं त्वया ज्ञातं स्त्रीकलेवरमिति ? )
वीरकः- सावसेसेहिं केस-हस्त-पाणि-पादेहि उवलक्खिदं मए । ( सावशेषैः केश-हस्त-पाणि-पादैरुपलक्षितं मया । )
अधिकरणिकः- अहो ! धिक् वैषम्यं लोकव्यवहारस्य ।
तट के गिरने के कारण, प्रसन्नम्=निर्मल, जलम्=पानी, कलुषायते=मलिन हो रहा है ॥२४॥
अर्थ—अधिकरणिक—
दुख है, निर्मल चान्दनी वाला यह चन्द्रमा राहु द्वारा निगला जा रहा है। तट के गिरने के कारण निर्मल जल कलुषित ( मैला ) हो रहा है ॥२४॥
टीका- वीरकस्य वचनानि शकारकृतारोपस्य साधकानीति दुःखं प्रकटयति, अधिकरणिकः-एष इति । भोः=इदं दुःखसूचकमव्ययं तत्रस्थानामा मन्त्रणायेति बोध्यम्, निर्मला=शुभ्रा, ज्योत्स्ना=कौमुदी यस्य तादृशः एषः=पुरोवर्तमानः, शशी= चन्द्रः चारुदत्तरूप इत्यर्थः, राहुणा=सिंहिकापुत्रेण ग्रहविशेषेण, ग्रस्यते=कवलीक्रियते, प्रसन्नम्=निर्मलम्, जलम्=वारि, कूलस्य=तटस्य, अवपातेन=भङ्गेन, कलुषायते= मलिनाथते । अकलुषं कलुषं क्रियते इत्यर्थे साधु । पथ्यावक्त्रं वृत्तम् ॥२४॥
अर्थ- वीरक ! आपका न्याय बाद में देखेंगे, न्यायालय के दरवाजे पर जो घोड़ा खड़ा है उस पर चढ़ कर जाकर पुष्पकरण्डक उद्यान में देखिये -'क्या वहाँ कोई स्त्री मरी पड़ी है ।'
वीरक- श्रीमान् की जैसी आज्ञा । (ऐसा कह कर निकला और प्रवेश करके) वहाँ गया था, वहाँ जंगली जानवरों द्वारा खाया जाता हुआ स्त्री का शरीर देखा ।
श्रेष्ठी और कायस्थ- तुमने यह कैसे जाना कि वह स्त्री का शरीर है ?
वीरक- बचे हुये केश, हाथ और पैर से मैंने जाना (कि स्त्री का शरीर है) ।