भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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नवमोऽङ्कः ५४३

मनप्रयोजनम् ?

वीरकः-- ही ही ! बन्धण-भेअण-सम्भमे अज्जकं अण्णेसन्तो ओवारिदं पवहणं वच्चदित्ति विआर करन्तो अण्णेसन्तो 'अरे ! तुए वि आलोइदे मए वि आलोइदव्वो' त्ति भणन्तो ज्जेव चन्दणमहत्तरेण पादेण ताडिदो म्हि । एदं सुणिअ अज्जमिस्सा पमाणं । ( ही ही ! बन्धनभेदनसम्भ्रमे आर्यकमन्वेषयन् अपवारितं प्रवहणं व्रजतीति विचारं कुर्वन् अन्वेषयन्--'अरे ! त्वयापि आलोकिते मयापि आलोकयितव्यम्' इति भणन्नेव, चन्दनमहत्तरेण पादेन ताडितोऽस्मि । एतन श्रुत्वा आर्यमिश्राः प्रमाणम् । )

अधिकरणिकः-- भद्र ! जानीषे कस्य तत् प्रवहणमिति ?

वीरकः-- इमस्स अज्जचारुदत्तस्स । वसन्तसेणा आरूढा, पुप्फकरण्डकजिण्णुज्जाणं कीलिदुं गोअदि त्ति पवहणवाहएण कहिदं । ( अस्य आर्यचारुदत्तस्य । वसन्तसेना आरूढा, पुष्पकरण्डकजीर्णोद्यानं क्रीडितुं नीयत इति प्रवहणवाहकेन कथितम् । )

शकारः-- पुणोवि शुद अज्जेहि ? ( पुनरपि श्रुतमार्यैः ? )

अधिकरणिकः--

एष भो ! निर्मलज्योत्स्नो राहुणा ग्रस्यते शशी । जलं कूलावपातेन प्रसन्नं कलुषायते ॥ २४ ॥


तुम्हारे आने का क्या प्रयोजन है ?

वीरक-- हथकड़ी बेड़ी तोड़ने से हुयी घबड़ाहट में आर्यक को खोजता हुआ 'ढकी हुई गाड़ी जा रही है', यह सोचकर उसकी जानकारी ( तलाशी ) लेते हुये 'अरे तुम्हारे ( चन्दनक के ) द्वारा देखी जाने पर मुझे भी देखना चाहिये' ऐसा कहते हुये ही मुझे सेनापति चन्दनक ने पैर से मारा है। यह सुनकर आप विद्वान ही प्रमाण हैं । ( उचित निर्णय करने वाले हैं ।)

अधिकरणिक-- श्रीमन् ! जानते हो कि वह गाड़ी किसकी थी ?

वीरक-- इसी आर्य चारुदत्त की । वसन्तसेना चढ़ी हुई थी, 'रमण के लिये पुष्पकरण्डकजीर्णोद्यान में ले जायी जा रही है' - ऐसा गाड़ीवान ने कहा था ।

शकार-- श्रीमन् आपलोगों ने फिर सुन लिया ?

अन्वयः-- भोः, निर्मलज्योत्स्नः, एषः, शशी, राहुणा, ग्रस्यते, कूलावपातेन, प्रसन्नम्, जलम्, कलुषायते ॥२४॥

शब्दार्थ-- भोः=कष्ट है, निर्मलज्योत्स्नः=निर्मल चाँदनीवाला, एषः=यह, शशी=चन्द्रमा, राहुणा=राहु के द्वारा, ग्रस्यते=निगला जा रहा है, कूलावपातेन=